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भारी मंत्रिमंडल

मौजूदा सरकार जब से सत्ता में आई, तभी से कैबिनेट के आकार पर विवाद चल रहा है। इसकी आलोचना राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर हुई है। हम जिस तरह के गरीब देश हैं और जिस तरह हम पर कर्ज है, उसे देखते हुए यह वाजिब नहीं है कि एक संघीय कैबिनेट में 62 सदस्य हों। इन सभी 62 सदस्यों को एक स्तर का भत्ता और सुविधाएं मिलती हैं। वे जैसे ही अपने दरवाजे के बाहर कदम रखते हैं, तो अधिकतम प्रोटोकाल की मांग करते हैं। वे हमारे खजाने पर भार स्वरूप हैं। इतना सब होने के बावजूद वे हमारी छवि को सुधारने में कोई भूमिका नहीं निभाते, जबकि दूसरे देशों के मंत्रिमंडल के आकार बहुत छोटे हैं। उदाहरण के लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को छोड़कर कुछ देशों की कैबिनेट इस प्रकार है-ब्रिटेन 22, नार्वे 19, फ्रांस 19, जर्मनी 15, सऊदी अरब 22, ऑस्ट्रेलिया 21, अर्जेटीना 18, कनाडा 36, और अमेरिका 15।  
द न्यूज, पाकिस्तान

बिजली संकट
जितनी तेजी से इन दिनों बिजली की कटौती हो रही है, वह चिंताजनक है। उससे भी बुरी बात यह है कि अधिकारी या तो यह बताना नहीं चाहते या बता पाने में असमर्थ हैं कि एक महीने पहले ही जब बिजली की हालत में सुधार बताया जा रहा था तो वह अचानक बिगड़ कैसे गई। यह भावना बिजली कटौती के कम होने से नागरिकों में पैदा हुई और लोगों को लगने लगा कि समस्या हल होने वाली है। वह धारणा अब खंडित हो चुकी है। अब जबकि बिजली कटौती दिन में आठ बार हो रही है तो अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए कि वे स्थिति से कैसे निपटेंगे। सरकार के यह कहते रहने का कोई मतलब नहीं है कि बिजली की स्थिति में सुधार हुआ है, जब जमीनी हकीकत एकदम उलट है। इसका पानी की सप्लाई पर भी विपरीत असर पड़ता है।
द डेली स्टार, बांग्लादेश

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