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रिबैलेंसिंग

निवेश पोर्टफोलियो की स्थिरता बनाए रखने और उसे बाजार के उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए जितना जरूरी सही स्त्रोंतों में निवेश करना है, उतना ही जरूरी अपने पोर्टफोलियो को समय-समय पर रिबैलेंस भी करना है।  हम अपनी संपत्ति बाजार में तेजी के समय बेचते हैं और मंदी के समय खरीदते हैं।

अच्छा रिटर्न हासिल करने के लिए यह नीति अधिक अपनायी जाती है। बावजूद कुछ प्रश्न ऐसे हैं जो पोर्टफोलियो रिबैलेंस करने की प्रक्रिया में निवेशक के सम्मुख उत्पन्न होते हैं। रिबैलेंसिंग का अभिप्राय अपने निवेश पोर्टफोलियो को जोखिम क्षमता के अनुरूप बनाना है।

उदाहरण के लिए स्टॉक मार्केट में आई 25 प्रतिशत की तेजी आपके इक्विटी पोर्टफोलियो को 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी देती है। जिससे आपके पोर्टफोलियों में  इक्विटी शेयर का प्रतिशत बढ़ जाएगा। पोर्टफोलियो को अपनी जोखिम क्षमता के अनुरूप करने के लिए आप अपने लाभ को डेट पोर्टफोलियो में ट्रांसफर करना होगा।

विशेषज्ञों के अनुसार मामूली उतार-चढ़ाव में पोर्टफोलियो को रिबैलेंस नहीं करना चाहिए। किसी संपत्ति को एक स्त्रोत से निकालकर दूसरे स्त्रोत में निवेश करने की प्रक्रिया में आपको कुछ खर्चे वहन करने होते हैं। ट्रांसेक्शन लागत, कर, ब्रोकरेज कमीशन और अन्य तरह के कुछ कारकों को ध्यान में अवश्य रखें। विशेषज्ञों के अनुसार संपत्ति आबंटन में 20 से 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी होने पर ही रिबैलेंस की प्रक्रिया को अपनाना बेहतर होता है।

म्यूचुअल फंड में आप एक फंड हाउस की दूसरी योजनाओं में निवेश कर सकते हैं। या राशि का कुछ हिस्सा इक्विटी शेयरों से निकालकर डेट  में ट्रांसफर कर सकते हैं। इसी तरह यूलिप में भी आप विभिन्न फंड्स में स्विच कर सकते हैं। इस प्रक्रिया में वहन किए जाने वाले खर्च को अवश्य ध्यान में रखें। विशेषज्ञों के अनुसार एक संतुलित फंड में 65 प्रतिशत भाग इक्विटी फंड का होता है।

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