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हिन्दुस्तानी संगीत में डूबने से होगी बोलने की दिक्कत दूर

हिन्दुस्तानी संगीत में डूबने से होगी बोलने की दिक्कत दूर

बोलने में होने वाली दिक्कतों संबंधी व्याधि लारीनजील ट्रेमर्स का उपचार तलाशने के क्रम में अमेरिकी शोधकर्ता अब हिन्दुस्तानी संगीत और मोजार्ट, वगेनेर, पुसीनी जैसे पश्चिमी शास्त्रीय संगीत का तुलनात्मक अध्ययन कर रहे हैं।

मिसूरी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ हेल्थ प्रोफेशंस में संचार विज्ञान एव विकृतियों के प्राध्यापक नंदू राधाकृष्णन ने कहा कि हिन्दुस्तानी एवं मोजार्ट जैसी शास्त्रीय गायन शैलियां काफी भिन्न हैं।

उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तानी गायन में प्रस्तुति देने वाला अपनी आवाज में स्वैच्छिक आधार पर उतार चढ़ाव लाने के लिए तान का इस्तेमाल करता है। शास्त्रीय संगीत में आवाज में बदलाव के लिए मुरकियां लेते हैं। इस ज्ञान के साथ हम ऐसी विशिष्ट उपचार पद्धति विकसित कर पाने में संभव हो सकते हैं जिससे लारीनजील ट्रेमर्स का इलाज हो सके।

विश्वविद्यालय ने एक बयान में कहा कि राधाकृष्णन हिन्दुस्तानी संगीत के मनोविज्ञान पर अध्ययन करने वाले पहले शोधकर्ता हैं। उन्होंने ओहिया में बाउलिंग ग्रीन राज्य विश्वविद्यालय के रोनाल्ड शेरुरे और पश्चिम बंगाल में गायन के अध्यापक शांतनु बंधोपाध्याय के साथ काम किया था।

जर्नल ऑफ वायस में हाल में प्रकाशित अध्ययन में राधाकृष्णन ने हिन्दुस्तानी एवं पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के बीच कई भिन्नताओं का पता लगाया है। राधाकृष्णन के अनुसार प्राथमिक भिन्नता यह होती है कि हिन्दुस्तानी संगीत में आवाज के उतार चढ़ाव के मामले में गहरा अवरोह होता है। राधाकृष्णन के शब्दों में इसे तान का चलन कहते हैं।

इसके विपरीत पश्चिमी शास्त्रीय संगीत में मुरकियां लगायी जाती है जिसमें आवाज में उतार चढ़ाव बहुत सुगम तरीके से किया जाता है। पश्चिमी गायक अपने गायन की आवृत्ति को बढ़ाने के लिए एक विशिष्ट दायरे को बढ़ाते हैं। इसमें कंठ को संकुचित कर और स्वर यंत्र को फैलाकर ऐसी आवाज निकाली जाती है जो कानों को मधुर लगती है।

लेकिन हिन्दुस्तानी संगीत में गायक इस पद्धति का इस्तेमाल नहीं करता। वह पश्चिमी शास्त्रीय संगीत की तुलना में अपने स्वर को बेहद नीचे ले जाता है और गाते समय उसकी आवाज उसकी सामान्य स्थिति में बोली जाने वाली आवाज के बेहद करीब होती है।

राधाकृष्णन ने यह भी पाया कि हिन्दुस्तानी संगीत के गायक को गीत का सटीक उच्चारण करना पड़ता है जबकि पश्चिमी संगीत के गायक का उच्चारण स्वरलिपियों से दिशानिर्देशित होता है।

हिन्दुस्तानी संगीत के रहस्य जानने के लिए राधाकृष्णन ने पारंपरिक भारतीय गायन शिक्षक को रिकार्ड किया जो एक ही तान के चलन को बार बार गाता है। हिन्दुस्तानी गायन में आम तौर पर गायक एक के बाद एक कई बार अपने स्वर में उतार चढ़ाव लाते हैं लेकिन राधाकृष्णन ने केवल एक चलन को रिकार्ड किया ताकि तकनीक का वैज्ञानिक अध्ययन किया जा सके।

राधाकृष्णन ने फेफड़ों का दबाव, स्वरयंत्र के खुलने और बंद होने तथा कंठ से बाहर निकलने वाली वायु की दर को नापने के उपकरणों के जरिये अपना अध्ययन किया।

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