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बिहार के साहित्यकारों का मूल्यांकन सही नहीं

हिन्दी साहित्य व पत्रकारिता के क्षेत्र में बिहार के अवदान को लेकर गुरुवार को देश के लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकारों व पत्रकारों ने यहां विचार-मंथन किया। आजादी से पहले व आजादी के बाद की पत्रकारिता व साहित्य पर सबने विचार रखे। सभी एकमत थे कि हिन्दी साहित्य व पत्रकारिता के विकास में बिहार के पत्रकारों व साहित्यकारों का योगदान किसी से कम नहीं है पर इसे कम करके आंका जाता रहा है। साहित्य का केन्द्र नहीं होने की वजह से यहां के साहित्यकारों की उपेक्षा होती रही है। हालांकि हिन्दी में विशिष्ठ शैली के चार शैलीकार बिहार ने दिए हैं। बिहार के साहित्यकार जब बाहर से छपते हैं तभी उनकी या उनकी रचना चर्चा में आती है।ड्ढr ड्ढr बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के सभागार में माखनलाल चतुव्रेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल द्वारा बिहार राष्ट्रभाषा परिषद व आचार्य शिवपूजन सहाय स्मारक न्यास के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय आचार्य शिवपूजन सहाय स्मृति प्रसंग के आखिरी दिन हिन्दी साहित्य व पत्रकारिता में बिहार के अवदान को लेकर परिचर्चा हुई। इस मौके पर संस्थान के कुलपति अच्युतानन्द मिश्र व मैनेजर पांडेय ने पत्रिका ‘सबलोक’ का लोकार्पण भी किया। स्वागत भाषण करते हुए कुलपति श्री मिश्र ने भी बिहार के साहित्यकारों व पत्रकारों की महती भूमिका को रखांकित किया। अध्यक्षता करते हुए हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक प्रो.मैनेजर पांडेय ने कहा कि बिहार ही नहीं देश के अन्य भागों में भी हिन्दी संस्थानों की दुर्गति हुई है।ड्ढr ड्ढr इसकी वजह यह रही कि आजादी के बाद के दिनों में खाओ, पीओ और मौज करो की संस्कृति बढ़ी। सत्ता से सुख व सुविधा पाने की चिंता हिन्दी वालों में अधिक हुई। सत्ता की भाषा होने के चलते हिन्दी में प्रवृत्तियां बदलीं। उनके मुताबिक 1वीं सदी में बिहार साहित्य का केद्र रहा। प्रभात खबर के संपादक हरिवंश ने कहा कि आज के हालात में जैसे ज्वलंत सवाल उठाए जाने चाहिए पत्रकारिता उसे उठाने में कामयाब नहीं हो पा रहा है। हालात को बदलने वाली पत्रकारिता होनी चाहिए।ड्ढr डा.खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि साहित्य आज कमजोर पड़ गया है। विमल कुमार ने कहा कि बिहार के रचनाकारों को उतनी अहमियत नहीं दी जा रही है। आचार्य किशोर कुणाल ने कहा कि जीवन में अनुशासन की कमी हो गयी है। डा.बलराम तिवारी ने कहा कि आंचलिक आंदोलन बिहार की ही देन है। केदारनाथ पांडेय, मंगलमूर्ति, उषा किरण खां, पांडेय कपिल आदि ने भी अपने विचार रखे। बहस के दौरान प्रखर पत्रकार प्रभाष जोशी व आलोचक डा.नामवर सिंह भी मौजूद थे।

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