DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

गरीबों के पक्ष में छोटी कर्ज संस्थाएं

हाल के वर्षों में गरीबों, खासकर ग्रामीण भारत के गरीबों को कर्ज मुहैया कराने में लघु-वित्तीय ऋण संस्थाएं एक महत्वपूर्ण ताकत के रूप में उभरी हैं। एक दशक से भी कम अवधि में इन्होंने न सिर्फ देश के करीब 2.7 करोड़ कर्जदारों तक अपनी पहुंच बनाई है, बल्कि इनका कर्ज पोर्टफोलियो भी लगभग 25000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इन संस्थाओं के तहत दी गई कर्ज की राशि औसतन 10,000 रुपये प्रति व्यक्ति है।
अब जरा इन आंकड़ों को कुछ संदर्भों के साथ देखिए। देश के अधिकृत व्यावसायिक बैंक भी ग्रामीण गरीबों को प्रत्यक्ष रूप से या फिर संबद्ध स्व-सहायता समूहों के जरिये कर्ज बांटते हैं। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद के करीब 40 वर्षो में मार्च 2009 के अंत तक इन व्यावसायिक बैकों के पास 3.9 करोड़ ऋणधारक थे। इन बैंकों द्वारा अपने ग्राहकों को अधिकतम 25,000 रुपये तक कर्ज दिए जाते हैं। 31 मार्च, 2009 तक इन बैंकों का अपने कजर्दारों के पास कुल कर्ज 43,000 करोड़ रुपये का था, जबकि स्व-सहायता समूहों को दिया गया ऋण 22,600 करोड़ रुपये का था।
मेरा मानना है कि जिस गति से लघु वित्तीय संस्थाएं इस समय विकास कर रही हैं, उसे देखते हुए अगले दो वर्षों के भीतर वे गरीबों को सीधे ऋण देने के मामले में अधिकृत व्यावसायिक बैंकों की बराबरी कर लेंगी, न सिर्फ ऋण ग्राहकों की संख्या के मामले में, बल्कि उन्हें कर्ज के रूप में आवंटित धनराशि के मामले में भी। बहुत संभव है कि वे निजी और स्व-सहायता समूह, दोनों रूपों में कर्ज बांटने में व्यावसायिक बैंकों से आगे भी निकल जाएं। क्रेडिट रेटिंग ऐंड इनफॉर्मेशन सर्विस ऑफ इंडिया लिमिटेड (क्रिसिल) के मुताबिक, मार्च 2012 तक ये लघु-वित्तीय ऋण संस्थाएं पांच करोड़ ऋण ग्राहकों तक अपनी पह़ुंच बना लेंगी और इनका ऋण पोर्टफोलियो भी 50,000 करोड़ रुपये की सीमा को पार कर जाएगा। जाहिर है, ये आंकड़े इस बात की तसदीक करते हैं कि लघ़ु-वित्तीय ऋण संस्थाएं देश के वंचित ग्रामीणों को कर्ज मुहैया कराने का एक शक्तिशाली माध्यम बन गई हैं। इस ऋण प्रक्रिया के जरिये वे गरीबों को अपनी आमदनी बढ़ाने और अपने जीवन-स्तर में सुधार लाने में सहयोग दे रही हैं और इस प्रकार वित्तीय समायोजन में इनका महत्वपूर्ण रोल है।
अब जरा उन कारकों की पड़ताल कीजिए, जिनकी वजह से लघु-वित्तीय ऋण संस्थाओं को इतनी व्यापक और इस अनुपात में कामयाबी मिली है। सबसे पहले तो इन्होंने प्रौद्योगिकी में निवेश किया। इससे अग्रणी लघु-वित्तीय ऋण संस्थाओं को न सिर्फ अपना व्यापार बढ़ाने में मदद मिली, बल्कि वे हर एक खाते की बेहतर निगरानी कर पाने में भी सक्षम हुई हैं। दूसरा, इन संस्थाओं द्वारा समूह कर्ज के लिए संयुक्त दायित्व मॉडल अपनाया गया है। इस मॉडल से कर्ज लेने वालों पर एक तरह से सामाजिक दबाव रहता है कि वे वक्त पर ऋण की अदायगी करें। इस मॉडल ने लघु-वित्तीय ऋण संस्थाओं को अपने द्वारा होने वाली चूकों से भी काफी हद तक निजात दिला दी है।
तीसरा, पिछले तीन वर्षों में लघु-वित्तीय ऋण संस्थाएं निजी शेयर के रूप में करीब 2,500 करोड़ रुपये की पूंजी उगाहने में सफल रही हैं और यह पूंजी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी के रूप में अपने भीतर ढांचागत सुधार लाने के लिए उनके काम आ रही है। हाल ही में एक अग्रणी लघु-वित्तीय ऋण संस्था ने खुद को शेयर बाजारों में सूचीबद्ध कराके उसके जरिये पूंजी जुटाई है। अंतिम कारक के रूप में लघु-वित्तीय ऋण संस्थाओं को भारत की मजबूत बैंकिग व्यवस्था के सहयोग और उनकी प्रबंधकीय टीम के अनुभवों का भी लाभ मिला है।
हालांकि इस क्षेत्र के आगे कुछ चुनौतियां भी हैं। पहली और सबसे प्रमुख चुनौती तो यह धारणा ही है कि ये संस्थाएं गरीबों की कीमत पर मुनाफाखोरी कर रही हैं। निस्संदेह, यह धारणा ऊंची ब्याज दर से निकली है, जिसके तहत संस्थाओं द्वारा ग्राहकों से करीब 24 से 28 फीसदी सालाना ब्याज वसूला गया। फिर भी मेरी राय में लघु-वित्तीय ऋण संस्थाएं महाजनों-साहूकारों की तुलना में कम ब्याज पर ही गरीबों को कर्ज उपलब्ध करा रही हैं। इन संस्थाओं की कर्ज दर क्रेडिट कार्ड की दर से भी सस्ती है। फिर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि लघु-वित्तीय ऋण संस्थाओं के संचालन में, यानी जरूरतमंद गरीबों तक पहुंचने और उनसे कर्ज वसूली पर भी अच्छा-खासा खर्च होता है।
बहरहाल, सवाल यह है कि क्या ये ऋण संस्थाएं कर्ज पर लगने वाले ब्याज की दर कम कर सकती हैं? मेरा मानना है कि वे ऐसा कर सकती हैं और ऐसा उन्हें करना भी चाहिए। दरअसल, ऐसा करने से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और उन्हें अनुपात का लाभ होगा। कुछ संस्थाओं ने दर घटाना शुरू भी कर दिया है। लघु-वित्तीय ऋण संस्थाओं के आगे दूसरी बड़ी चुनौती पारदर्शिता व प्रशासकीय मानकों के जरिये हिस्सेदारों का भरोसा जीतने की है। ऋण ग्राहकों से संपर्क के दौरान इन संस्थाओं को अपने उत्पाद की शर्ते पारदर्शी तरीके से बतानी चाहिए। उन्हें अपेक्षित कर्ज पर प्रभावी प्रोसेसिंग शुल्क, बीमा शुल्क आदि के बारे में साफ-साफ बताया जाना चाहिए, ताकि वे उत्पाद की वास्तविक कीमत जान पाएं और उपलब्ध विकल्पों के साथ उसकी तुलना कर सकें। इसी तरह, इन संस्थाओं को एक स्वतंत्र तीसरी पार्टी से ऑडिटिंग भी करानी चाहिए। इससे इनमें निवेशकों, नियामक संगठनों व सरकारी एजेंसियों का भरोसा बढ़ेगा।
लघ़ु-वित्तीय ऋण संस्थाओं के आगे प्रबंधन की भी चुनौतियां हैं। अपने जोखिम प्रबंधन को चाक-चौबंद बनाने के लिए उन्हें एक ऐसा तंत्र विकसित करना पड़ेगा, जो धोखाधड़ी की शिनाख्त करने में सक्षम हो, बल्कि वह किसी तरह के फर्जीवाड़े को रोक सके। ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि यह नकद राशि का कारोबार है। इस क्षेत्र में चूक होने का भी खतरा है, क्योंकि वित्तीय संस्थाओं के बीच की कड़ी स्पर्धा उन्हें कर्ज बांटने और उनकी वसूली के अनुशासन को शिथिल करने के लिए बाध्य कर सकती है, खासकर नए भौगोलिक इलाकों में।
लघ़ु-वित्तीय ऋण संस्थाएं इन तमाम पहलुओं से वाकिफ हैं और इन चुनौतियों से निपटने के लिए उन्होंने कदम भी उठाए हैं। हाल ही में इस क्षेत्र ने एक स्वशासी निकाय (एम-फिन) का गठन किया है, जो इन संस्थाओं के लिए वहनीय कार्यप्रणाली का खाका तैयार करेगा। साथ ही इसने एक ‘क्रेडिट ब्यूरो’ के साथ भी सहयोग करना शुरू किया है, ताकि ग्राहकों का डाटाबेस तैयार किया जा सके। इस कदम से कर्ज के जोखिम को कम किया जा सकेगा। कुल मिलाकर, भविष्य में इस क्षेत्र की कामयाबी इसी बात पर निर्भर करेगी कि वह इन चुनौतियों से किस तरह से निपटता है।

लेखिका देश की प्रमुख रेटिंग व रिसर्च कंपनी क्रिसिल की सीईओ हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:गरीबों के पक्ष में छोटी कर्ज संस्थाएं