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ब्लॉग वार्ता : चलती का नाम गाड़ी

पर्यटन जबसे ट्रैवल हो गया है, घूमना मुश्किल होता जा रहा है। बिना एजेंट के सहारे न शहर का पता चलता है न होटल का। एक जमाना था जब हिन्दी में लोग ज्यादातर यात्राएं लंदन अमेरिका से लौटे साहित्यकारों के संस्मरणों में किया करते थे। मेरी पहली बर्लिन यात्रा, मेरी पहली वेनिस यात्रा। जब से यात्राओं में जाने वाले लोगों का वर्ग विस्तार हुआ तब से यात्राओं के संस्मरणों की लोकप्रियता कम हुई है। फिर भी कुछ लोग हैं जो आदतन घुमक्कड़ हैं। ललित शर्मा का ब्लॉग मिला है मुझे, जिसका नाम है चलती का नाम गाड़ी। क्लिक करने के लिए जाना होगा इस पते पर- http://yatra4all.blogspot.com
ललित हमें तुरतुरिया ले चलते हैं। बताते हैं कि रायपुर से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर दूर वारंगा की पहाड़ियों के बीच बहने वाली बालमदेई नदी के किनारे पर है तुरतुरिया। तुरतुरिया के बारे में कहते हैं कि श्रीराम द्वारा परित्याग करने पर वैदेही सीता ने यहां पर वाल्मीकि आश्रम में आश्रय लिया था। लव-कुश का जन्म यहीं हुआ था। यहां के मंदिर के नीचे बाईं ओर एक जल कुंड है। उसके ऊपर एक गौमुख बना है, जिसमें डेढ़ दो इंच मोटी जलधारा तुर-तुर की आवाज करती हुई बहती है। शायद इसी कारण इसका नाम तुरतुरिया पड़ा है। किसी भी यात्रा में जगहों के नाम की कहानी दिलचस्प होती है। लोगों ने वाल्मीकि या सीता के नाम पर जगह का नाम नहीं रखा बल्कि प्रातिक ध्वनि से नाम उधार ले लिया। ललित लिखते हैं कि तुरतुरिया की प्राकृतिक छटा निराली है। यात्राखोर ललित अब कामाख्या मंदिर का वृत्तांत सुना रहे हैं। बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में इसे कौरू नगर कहा जाता है। कई तरह की मान्यताएं भी रही हैं कि मंत्र-तंत्र से आदमी को पशु-पक्षी बनाकर रख लिया जाता है। कामाख्या मंदिर गुवाहाटी से 12 किलोमीटर दूर है। 51 शक्ति पीठों में से कामाख्या को सर्वश्रेष्ठ पीठ माना जाता है। हर साल जब चार दिनों तक यहां अम्बुवासी मेला लगता है, तो इस दौरान असम में कोई शुभ कार्य नहीं होता है। मान्यता है कि रति के पति कामदेव शिव की क्रोधाग्नि में यहीं पर भस्म हुए थे। अहोम राजाओं ने पूजा कराने के लिए कन्नौज और मिथिला से ब्राह्मणों को लाकर बसाया था। आज वे असम की संस्कृति में इतना रच बस गए हैं कि कोई अंतर नहीं कर सकता। ललित शर्मा लिखते हैं कि जब गर्भ गृह के पास जाकर पूजा करने लगा तभी एक लड़की पर नजर पड़ी। उसने हाथ और गले में बहुत सारे गंडे डोरे बांध रखे थे। सिंदूर से मुंह लाल कर रखा था। मैंने अपने मित्र से कहा कि यह कोई नयी जादू सीखने वाली लगती है। तभी पंडे ने कहा कि यह एकता कपूर है। मैंने डॉक्टर मित्र से कहा कि एकाध फोटू खिंचवा लेते हैं। डॉक्टर साहब ने कहा कि इसके साथ क्या फोटो खिंचवाना जिसने लोगों के घर बर्बाद कर दिये हों।
हरियाणा के नारनौल। दिल्ली से गुड़गांव, गुड़गांव से रेवाड़ी, अटेली मंडी होते हुए नारनौल पहुंचे। औरंगजेब के शासनकाल में यहां सतनामियों के साथ युद्घ का उल्लेख है, जिनमें औरंगजेब की सेना हार गई थी। औरंगजेब की सेना सतनामियों से लड़ना नहीं चाहती थी। भ्रम फैल गया कि सतनामियों को जादू-टोना आता है, जिससे उनमें दैवी ताकतें हैं और हम युद्ध फिर हार जाएंगे। फिर औरंगजेब की सेना ने ताबीज बांधी और सतनामियों को हराया।
नारनौल का जलमहल देखने लायक है। जलमहल अकबर के विश्राम करने के लिए बनाया गया था। नारनौल में बीरबल का छत्ता नामक एक जगह है, जिसके बारे में किंवदंती है कि यहां से एक सुरंग दिल्ली तक जाती है। यहां से ललित पहुंच जाते हैं वर्धा। जहां ग्रामीण अभियांत्रिकी अनुसंधान केंद्र है। यहां कम लागत में घर बनाने के लिए कई प्रयोग किये गए हैं। बिना लकड़ी और लोहे की छत बनाई जाती है, जो काफी मजबूत होती है।
घूमते-घामते ललित औरंगाबाद पहुंच जाते हैं। यहीं पर है ताजमहल का प्रतिरूप बीबी का मकबरा। इसके बाद वे शनि के गांव सिंघनापुर का वृत्तांत लिख बैठते हैं। गांव में घुसते ही नाका लगा है। जहां पर पंचायत की तरफ से कार वालों से छह रुपये वसूले जा रहे हैं। अंदर प्रवेश करते ही मोटरसाइकिल सवार एजेंट ने हमें कब्जे में कर लिया। पता चला कि वो पूजा सामग्री दुकान वाले का एजेंट हैं। हिन्दी में यात्रा विशेषांकों की घोर कमी है। बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान दो-दो सौ पन्नों के यात्रा विशेषांक छपते हैं। उनमें विज्ञापनों की भरमार होती है। हिन्दी के लोग पता नहीं मजदूरी के लिए कब तक पलायन करते रहेंगे। पर्यटन का भी संस्कार होना चाहिए।
ravish@ndtv.com 
लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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