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जीने का मकसद

हमारा जीवन आमतौर पर बाजार की जरूरतों के हिसाब से ही तैयार होता है। बचपन से जवानी तक की सारी पढ़ाई-लिखाई इसी हिसाब से होती है कि बड़े होकर हम कुछ बन सकें। डॉक्टर, इंजीनियर, मैनजर या कुछ और जिसकी बाजार में मांग हो। पैसे भी अच्छे मिलते हों और इज्जत भी। हमें इससे जो पैसा मिलता है, उससे हमारा और हमारे परिवार का जीवन चलता है। इसीलिए हम इस काम को करते हैं या करना पड़ता है। यह रूटीन हमारी जिंदगी चलाता है, पर यह हमारे जीवन को उबाऊ भी बनाता है। रोज-रोज वही काम, कुछ नया नहीं, लगता है कि हमने सिर्फ इसी के लिए धरती पर जन्म लिया है- आपको अक्सर लोग यही शिकायतें करते मिल जाएंगे। कुछ लोगों की जिंदगी इन्हीं शिकायतों में गुजर जाती है और कुछ में ऐसी शिकायतें बाकायदा कुंठा का रूप ले लेती हैं, लेकिन इससे बचने का तरीका क्या है?
मशहूर दार्शनिक बर्टेंड रसेल ने अपनी किताब ‘दुख और सुख के बाबत’ में इसका एक तरीका सुझाया था। उनका कहना था कि सुख हासिल करने का तरीका है कि जीवन को किसी बड़े मकसद के लिए समर्पित कर दें। सुनने में यह थोड़ा मुश्किल लग सकता है, लेकिन यह काम कठिन नहीं है। कई लोग अपने इसे कर भी रहे हैं।
मसलन एक पुराने मुहल्ले में रहने वाले शर्मा जी ने तय किया कि वे लोगों की सेहत सुधारने के लिए उन्हें योग करने की प्रेरणा देंगे। अब वे मुहल्ले के पार्क में सवेरे लोगों को एक घंटे के लिए योग सिखाते हैं। आपको कई ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो धरती को बचाने के लिए पेड़ लगाने और उन्हें पानी देने का काम करते हैं। एक सज्जन ऐसे भी हैं जिन्हें डर है कि कहीं कौवे लुप्त न हो जाएं इसलिए वे उनके खाने-पीने का इंतजाम करते हैं। आप भी ऐसा मकसद ढूंढ़ लीजिए, दुनिया के लिए कुछ हो जाएगा और आपकी काम की बोरियत भी जाती रहेगी।

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