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सुलह और नीयत

अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद स्थानीय स्तर पर शुरू हुईं सुलह की कोशिशों का स्वागत होना चाहिए। इस पहल के लिए कदम बढ़ाने वाले सुन्नी वक्फ बोर्ड के पक्षकार हाशिम अंसारी और अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत ज्ञान दास की बातचीत से उम्मीद बनती है कि इस मामले का पटाक्षेप हो सकता है। यह उम्मीद इसलिए भी बनती है कि वहां कोई बड़ी राजनीति नहीं बल्कि भाईचारे का भारी दबाव है। वे लोग 16 अक्टूबर को लखनऊ में होने वाली आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक के पहले कोई फामरूला निकाल लेना चाहते हैं, ताकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट न जाए। उधर पर्सनल लॉ बोर्ड स्थानीय समझौते की ज्यादा उम्मीद न देखते हुए सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए कई हिंदू-मुस्लिम संगठनों का समर्थन भी जुटा रहा है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर सुलह की किसी कोशिश के बजाय उन लोगों को बांटने और कमजोर करने की चाल दिखाई देती है, जो किसी तरह का कोई स्थानीय समझौता करना चाहते हैं। इसीलिए जैसे ही इस मामले पर राष्ट्रीय हलचल और बयानबाजी शुरू होती है, वैसे ही आशंकाओं के बादल घिरने लगते हैं। राजनीतिक दल इस मामले को राजनीति और वोट बैंक से हटकर देखने को तैयार नहीं हैं। कहा जाता है कि जीत में संयत और हार में आक्रामक होना चाहिए, विशेषकर अगर इस फैसले में भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार के खुश होने के लिए काफी बातें हैं, तो उन्हें यह कोशिश करनी चाहिए कि वे अल्पसंख्यकों की आहत भावनाओं पर मलहम लगाएं और अपनी साफ नीयत से सुलह की कोशिशें करें, पर वैसा दिखाई नहीं पड़ रहा है। भारतीय राजनीति में भूचाल पैदा करने वाली सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा के नायक लालकृष्ण आडवाणी कहने लगे हैं कि फैसले ने उनकी यात्रा को सही ठहराया है, तो विश्व हिंदू परिषद और संतों के संगठन की तरफ से 2.77 एकड़ ही नहीं बल्कि पूरे 70 एकड़ की जमीन पर राम मंदिर बनाने की मांग उठने लगी है। 
जबकि अदालत से काफी कुछ हासिल करने के बाद संघ परिवार को छह दिसंबर 1992 की घटना के लिए अफसोस जताकर अल्पसंखकों के साथ विश्वास का माहौल बनाना था। इसी माहौल में समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव का यह कहना कि फैसला कानून और सबूत पर नहीं आस्था पर दिया गया है, विवाद को अदालत और समझौते की पंचायत से बाहर फिर राजनीति के अखाड़े में खींच लाता है। ऐसे में जहां बहुजन समाज पार्टी मौन रहने को विवश है, वहीं कांग्रेस से कुछ कहते नहीं बन रहा है। पहले फैसले को मानने की अपील और बाद में सुप्रीम कोर्ट का विकल्प और फिर छह दिसंबर 1992 के अपराध का स्पष्ट उल्लेख भी सामुदायिक जनाधार को संतुष्ट करने में काफी नहीं साबित हो पा रहे हैं। दरअसल अयोध्या का मामला जमीन से ज्यादा वोट बैंक और विचारधारा का विवाद बन कर रह गया है। उसे सेक्युलरवादी और हिंदुत्ववादियों ने अपनी-अपनी प्रयोगशाला बना लिया है और वे वहां आम सहमति का कोई स्मारक कभी नहीं बनने देना चाहते। ऐसे में इतने बड़े विवाद को अयोध्या के स्थानीय विवेक से हल करने का ख्याल एक आकर्षक यूटोपिया है। हालांकि राष्ट्रीय ताकतों के पास वह भी नहीं है, पर वे उसे शायद ही साकार होने दें। 

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