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इच्छा शक्ति का अभाव

पड़ोसी देश श्रीलंका में वर्षों से चली आ रही रक्तरंजित हिंसा में हजारों लोगों ने प्राण गंवाये। हमारी सरकार ने भी शांति स्थापना के उद्देश्य से अपने जवानों को भेजा, जिनमें से कई वापस न आ पाये। उपद्रवों के कारण उद्योग-धंधे बंद हो गये। पर्यटन व्यवसाय ठप हो गया, देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी थी। ऐसी स्थिति में वर्तमान राष्ट्रपति महिन्द्रा राजपक्षे ने दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुये लिट्टे जैसे भयंकर नाग का फन कुचल कर देश को टूटने से बचाया। अपने देश में भी पंजाब का आतंकवाद हम सभी ने देखा है और उस पर काबू होते हुए भी देखा। भारत के दक्षिण को अपने इशारों पर नचाने वाले वीरप्पन का खात्मा भी देखा। निश्चय ही यह बस कुछ इच्छाशक्ति की दृढ़ता का ही प्रतिफल था। बिहार में पन्द्रह सालों से चले आ रहे जंगलराज की समाप्ति और सुशासन का प्रारंभ भी हमने देखा। तो क्या कारण है कि विकराल रूप धारण कर रहे नक्सलवाद का अंत करने में देश खुद को असमर्थ पा रहा है? यह नपुंसकता आम भारतीय की समझ से परे है। कभी शक होता है कि हमारे कर्णधार कहीं नक्सलियों से मिले तो नहीं? किसी नक्सली नेता या उसके अनुयायियों के मारे जाने पर जांच की मांग की जाती है किन्तु अपनी जान की परवाह न करते हुए इन दरिन्दों से लड़ते हुये मरने वाले जवानों की मृत्यु का तथा कथित मानवाधिकारवादियों की नजर में कोई मूल्य नही होता। सर्वाधिकार सम्पन्न सत्ता के समक्ष असंभव कुछ नहीं हो सकता, बशर्ते इच्छाशक्ति हो।
एलपी सिलोड़ी, कोटद्वार

मर्यादा में रहें टीवी चैनल
लिव-इन रिलेशनशिप का इन दिनों बड़ा प्रचार किया जा रहा है। टीवी चैनलों पर इस विषय पर पिछले एक महीने से खूब चर्चा कराई जा रही है, जिसमें युवकों और युवतियों को (सिर्फ एक धर्म विशेष को मानने वालों को) शामिल किया जाता है। ऐसा लगता है जैसे लिविंग रिलेशनशिप का प्रचार करने का प्रयास हो रहा हो, बच्चों तक उसे पहुंचाने की कोशिश हो रही हो। युवकों-युवतियों से इस पर चर्चा कराना, इसके गुण-दोषों के साथ मानवाधिकारों/स्वतंत्रता का घालमेल करना इन चर्चाओं से लिव इन रिलेशनशिप का विचार युवा मनों में रोपा जा रहा है। ऐसे विषयों से कम से कम दूरदर्शन को तो दूर ही रहना चाहिए, पर क्योंकि सबसे पहले दूरदर्शन ने इस पर चर्चा कराई, इसलिए भला दूसरे चैनल क्यों पीछे रहते? भारत दुनिया के दूसरे देशों से बिल्कुल अलग सोच का देश रहा है। हमारे धर्म-ग्रन्थों ने, वेदों-उपनिषदों, गीता ने हमें इन्द्रियों पर नियंत्रण रखने की शिक्षा दी है न कि उच्छृंखल बनाने की। हमारी सोच भोगवादी नहीं है, उसकी दृष्टि से हमारे संस्कार, संस्कृति हमें सामाजिक सीमाओं में, मर्यादा में रहने को प्रोत्साहित करते हैं। जिस संस्कृति का प्रचार किया जा रहा है, वह हमारी संस्कृति के ठीक उल्टी है। अत: भारत के सब टीवी चैनलों को भी मर्यादा में रहना चाहिए, ऐसे विषयों पर चर्चा नहीं करानी चाहिए जिससे अमर्यादित, अमानवीय, अप्राकृतिक व्यवहार को प्रोत्साहन मिलता हो।
कुसुम, देहरादून

कुदरत का कहर
देश के कुछ हिस्सों को छोड़कर इस वर्ष के मानसून ने दशकों पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया है। विज्ञान, आस्थाएं, परंपरायें, धर्म, ज्योतिष जैसी तमाम मानवीय धारणायें कुदरत के इस कहर के समक्ष बौने साबित हुए। पूरे देश में बाढ़, भूस्खलन जैसी अनेकों आपदाओं ने धन-जन की कितनी क्षति पहुंचाई, सही आंकड़े खोजना शायद काफी मुश्किल होगा। उत्तराखंड की ही बात करें तो पिछले 3 माह से भी अधिक समय से लगातार वर्षा ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। सैकड़ों नहरों, पेयजल योजनाओं का बुरा हाल है। लोग अपने खेतों और मवेशियों से हाथ धो बैठे हैं। जहां आजकल कटाई-मंडाई जोरों पर होनी थी, वहीं तमाम खेतों में सड़ी-गली फसलें चारे के काम की भी नहीं रही हैं। पहाड़ी आलू का कहीं नामोनिशान नहीं। ऐसे में केन्द्र सरकार को चाहिए कि राज्य में अतिरिक्त राहत राशि भेजे ताकि देश के इस मध्य हिमालयी राज्य की जनता को प्रजातांत्रिक व्यवस्था पर भरोसा जाग्रत हो।
डॉ. गुलाब सिंह राणा, रुद्रप्रयाग

धारा 370 हटाना ही समस्या का समाधान
2001 की जनगणना के अनुसार जम्मू-कश्मीर की आबादी 68 लाख है। इसमें 67 फीसदी आबादी मुस्लिम और शेष हिन्दू है। यहां जम्मू व लद्दाख हिन्दू बहुल है और कश्मीर घाटी में मुस्लिम आबादी है। घाटी से करीब सभी हिन्दुओं को निकाल दिया गया है। हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता फरमा रहे हैं कि कश्मीर समस्या का हल भारतीय संविधान के दायरे में संभव नहीं है तो यह पाकिस्तान की ही जुबान है। धर्म के आधार पर इसका पुन: विभाजन नहीं होगा। अलगावादियों से कोई बात नहीं की जानी चाहिए। सबसे बड़ी भूल धारा 370 है जिसने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देकर अलगाववाद की ओर धकेला है। खुद को सेक्युलर कहने वाले दल, जो इस धारा को हटाने के विरुद्ध हैं, समझ लें इस धारा के रहते कश्मीर समस्या कभी हल नहीं होगी। उमर अब्दुल्ला को हटाकर कुछ समय के लिए राष्ट्रपति शासन लागू करना उचित रहेगा। सशस्त्र सेना विशेष अधिकार को न हटाया जाए।
चम्पत राय जैन, देहरादून

 

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