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पितरों को अर्पित पिंड को खाकर जीने को विवश परिवार

बिहार के गया जिले में कई गरीब परिवार ऐसे हैं जो गायों को खाने के लिए दिए जाने वाले पितरों को अर्पित पिंड को खाकर अपना और अपने परिवार के पेट की आग को बुझाने को विवश हैं। भगवान विष्णु की तपोस्थली और भगवान बुद्ध की ज्ञानस्थली गया में इन दिनों पित्रपक्ष मेला चल रहा है। पन्द्रह दिन तक चलने वाले मेले के दौरान देश-विदेश से लाखों की संख्या में तीर्थयात्री यहां आकर अपने पितरों के मोक्ष प्राप्ति हेतु उनका पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण करते हैं।

मोक्षस्थली गयाधाम के विष्णुपद मंदिर के देवघाट पर पिंडदान करने वाले तीर्थयात्री पितरों को अर्पित पिंडों को गायों के उपलब्ध नहीं होने पर आमतौर पर उसे फल्गू नदी में प्रवाहित कर देते हैं, जिसे वहां मौजूद ये गरीब लोग नदी से एकत्र कर उसे अपने घर ले जाते हैं। ये पिंड जौ अथवा चावल के आटा के बने होते हैं।

ये गरीब लोग इन पिंडों को घर ले जाकर धूप में सुखाते हैं और उसे मिल में पिसवाकर उसकी रोटी बनाकर भोजन के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। यह पूछे जाने पर कि शास्त्र के मुताबिक पिंडदान के बाद पितरों को अर्पित पिंडों किसे दिए जाने का प्रावधान है जगत गुरू स्वामी राघवाचार्य ने बताया कि हेमाद्री ऋषि के ग्रंथ चतुरवर्ग चिंतामणि में वर्णित श्राद्धकल्प के अनुसार विप्राजगावा का प्रावधान है, जिसके तहत पिंडदान तर्पण और श्राद्ध के बाद पान के पत्ते को बकरी को तथा पितरों को अर्पित पिंडों को गाय को खाने के लिए दे दिया जाए या फिर नदी में प्रवाहित कर दिया जाए।

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