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उत्तराखंड में क्यों हार गया पहाड़

अक्टूबर को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा कांड की बरसी थी। यह हादसा उत्तराखंड आंदोलन के लिए लड़ी गई लड़ाई का दुर्भाग्यपूर्ण दिन था। इस दिन राज्य आंदोलनकारी बड़ी संख्या में पुलिस बर्बरता के शिकार हुए। महिलाएं बलात्कार की शिकार हुईं। वे घाव लोगों के मन में अभी भी हरे हैं। सैकड़ों गवाह मौजूद हैं, लेकिन सजा अभी तक किसी को नहीं हुई। 

लोग कहने लगे हैं कि राज्य जरूर मिला, लेकिन बदला कुछ नहीं। पहाड़ यूपी के जमाने में कालापानी था और अब भी वैसा ही है। यहां के स्कूलों में उस जमाने में भी शिक्षक नहीं होते थे। हालात आज भी बदले नहीं हैं। अस्पतालों में डॉक्टर तब भी नहीं जाते थे। अब भी नहीं जा रहे हैं। पहाड़ के आम आदमी के संघर्षो में कोई परिवर्तन नहीं दिखाई दिया।

तब एक पर्वतीय विकास विभाग था और उसके पर्यवेक्षण के लिए प्राय: यहीं के विधायक मंत्री होते थे। अब पूरी सरकार अपनी है। विधायकों की संख्या 70 हो गई है। दर्जन भर मंत्री और अफसरों की फौज है। राज्य गठन को दस वर्ष हो चुके हैं। फिर पहाड़ी राज्य का मकसद क्यों पूरा नहीं हुआ। इसमें आने वाली बाधाएं दूर क्यों नहीं हुईं। चमोली, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी अभी भी यह सवाल पूछते हैं कि राज्य गठन का हमें क्या फायदा हुआ? 

फायदा तो हरिद्वार, रुद्रपुर और कुछ हद तक देहरादून को हुआ। कई बड़े कारखाने इन्हीं जिलों में लगे। यह और बात है कि स्थानीय लोगों को रोजगार का दिवास्वप्न दिखाकर कारखाना स्थापित करने वाले उद्योगपतियों ने वायदा नहीं निभाया।

इन तीन जिलों का विकास हुआ, इस पर किसी को परेशानी नहीं है। सवाल यह है कि पहाड़ी जिलों तक विकास की किरणें क्यों नहीं पहुंचीं। बातचीत में कई वरिष्ठ आंदोलनकारी कहते हैं- हमें पता था कि चमोली में कोई उद्योगपति कारखाना नहीं लगाएगा क्योंकि वहाँ अलग तरह की दुश्वारियां हैं, लेकिन यह उम्मीद जरूर थी कि जब अपने लोग सरकार में होंगे, फैसले करेंगे तो पहाड़ों का पलायन रोकने के लिए कुछ ठोस प्रयत्न जरूर करेंगे। 

यह भी माना गया था कि अपना राज्य होने पर जनता के सामने मामूली चीजों की दिक्कतें नहीं आएंगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो पाया। कई वरिष्ठ आंदोलनकारियों को इस बात का मलाल भी है कि राज्य बनने के बाद से ही आंदोलनकारी नौकरी, पेंशन के लिए मंत्रियों, विधायकों के चक्कर लगा रहे हैं। वहीं शमशेर सिंह बिष्ट, काशी सिंह ऐरी, गिर्दा, राजीव लोचन शाह सरीखे दर्जनों लोगों ने कभी आंदोलनकारी का तमगा हासिल करने के लिए आवेदन भी नहीं किया।

अब एक बार फिर से यह नवोदित राज्य पहाड़-मैदान की पुरानी परिपाटी की ओर तेजी से बढ़ रहा है। संभव है कि 2012 के शुरुआती दिनों में होने वाले विधानसभा चुनाव में इसका असर दिखने लगे। इस राज्य में विधानसभा क्षेत्रों की संख्या 70 है। इनमें से 36 सीटें मैदानी और 34 पहाड़ी जिलों में हैं।

शायद इसी अंकगणित के सहारे कुछ लोग सहारनपुर, बिजनौर के कुछ हिस्सों को यूपी से काटकर उत्तराखंड में मिलाने की बात कर रहे हैं, जिससे वे फिर से पहाड़ बनाम मैदान की लड़ाई को तेज कर अपना राजनीतिक हित साध सकें। अगर पहाड़ मैदान की यह लड़ाई तेज होती है तो कुमाऊं-गढ़वाल का भेदभाव मिटाने की चुनौती पहाड़ के लोगों के सामने होगी। ऐसे में जीत किसी की हो सकती है, लेकिन पहाड़ का तो नुकसान तय है।

दरअसल, यहां की लीडरशिप के जागने का वक्त आ गया है। पड़ोसी हिमाचल प्रदेश, पूर्वोत्तर राज्यों से सीखना होगा। हमें राज्य की जनता को उसके मूल निवास पर रोकने के उपाय करने होंगे। विकास का जमीनी खाका खींचना होगा। उन्हें आजीविका के साधन देने होंगे। यह कुटीर उद्योगों के जरिए संभव होगा। उन्हें चिकित्सा सुविधा वहीं उपलब्ध करानी होगी। पढ़ाने के लिए योग्य शिक्षक देने होंगे। इसके लिए जरूरत पड़ने पर शिक्षकों-डॉक्टरों की भर्ती ज्यादा पैसे देकर, खासतौर से पहाड़ के जिलों के लिए भी करनी पड़ी तो भी कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए।

राज्य में गोचर, चिन्यालीसौड़ (उत्तरकाशी) और पिथौरागढ़ में हवाई पट्टियां यूपी के जमाने से हैं। इनके जरिए हमें वैकल्पिक परिवहन इंतजाम करने होंगे। इसका लाभ आमजान उठा पाएं, इसके लिए जरूरी है कि उन्हें किराए में छूट भी दी जाए।

अगर शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर के साथ ही परिवहन की यह सुविधा मिल जाए तो इसमें कोई दो राय नहीं कि पहाड़ और यहां के लोगों को सुखद अहसास होगा। इसके लिए सभी दलों को एकजुट होना पड़ेगा। एक-दूसरे पर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोपों से ऊपर उठकर पहाड़ के हितों की बात करनी होगी। अगर ऐसा हो पाए तो रामपुर तिराहा के शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

लेखक देहरादून में हिंदुस्तान के स्थानीय संपादक हैं।

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