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टाइम-टाइम की बात है

बात हो रही थी फिल्म ‘रोबोट’ की। अन्ना कहने लगा- ‘सर जी, क्या आप जानते हैं कि रजनीकांत घड़ी नहीं रखता। कहते हैं कि सुपर स्टार खुद तय करता है कि कब क्या वक्त होना चाहिए।’ मैंने बताया- ‘हमारे एक बुजुर्ग भी नहीं रखते। उनका कहना है कि घड़ी-घड़ी घड़ी देखकर समय क्यों नष्ट किया जाए।’

अन्ना बोला- ‘दरअसल, घड़ी देखते रहना और वक्त को ठेंगा दिखाना हम भारतीयों का राष्ट्रीय शौक है। ‘समय से पहले कुछ नहीं मिलता या कुछ नहीं होता’ और ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ जैसे मुहावरे हमने गढ़ रखे हैं। इसलिए कोई काम टाइम पर शुरू या खत्म नहीं होता, चाहे वह सरकारी योजना हो, शादी-ब्याह हो या कोई अन्य समारोह। अब देखिए, कॉमनवेल्थ गेम्स हमें 2003 में मिले थे, मगर..।’

मैंने हामी भरी : ‘गेम्स आयोजन समिति के एक अधिकारी से मैंने कहा- कम समय में ज्यादा काम कैसे किया जाता है, यह आपको किसी एक्सपर्ट से सीखना चाहिए था।’ जवाब मिला- ‘चाहते तो हम भी थे लेकिन टाइम ही नहीं मिला!’ अन्ना बोला- ‘गेम्स की तैयारियों में देरी इसलिए हुई कि ये लोग घड़ी की बजाय कैलेंडर देखते रहे।’

मैंने कहा- ‘काम को लटकाते रहना हमारे खून में रचा-बसा है। उस दिन मैंने किसी से कहा- टालमटोल मत करो। कहने लगा- दीवाली तक बहुत बिजी हूं, बाद में इस पर चर्चा करेंगे। कभी-कभी यह भी सुनने को मिल जाता है कि घड़ी देख लेना, ठीक पांच बजे पहुंच जाऊंगा, हां, 15-20 मिनट इधर-उधर हो सकते हैं। घड़ी होते हुए भी टाइम के अनुसार कोई नहीं चलता।’ अन्ना बोला- ‘मुसीबत यह है सर जी, कि जिस चीज को कभी चलना ही नहीं चाहिए, वह हमेशा टाइम पर ही चलता है।’ मैंने पूछा- ‘कौन है वह?’ अन्ना ने लम्बी सांस ली- ‘टाइम बम!’   

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