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बेमिसाल आयोजन

आलोचनाओं और आशंकाओं के बावजूद हमने राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन की शानदार शुरुआत कर वह कर दिखाया जो हम करना चाहते थे। यह आर्थिक महाशक्ति बन रहे लोकतांत्रिक राज्य की क्षमताओं की आतिशबाजी थी और क्रिकेट के अलावा बाकी खेलों की बहुआयामी संस्कृति विकसित करने का शंखघोष भी था।

यह आयोजन एशियाड से ओलंपिक तक होने वाली भारत की दौड़ का एक भव्य पड़ाव है और उम्मीद है कि भारत एक दिन उस मुकाम तक जरूर पहुंचेगा। इस आयोजन को न सिर्फ दुनिया भर के दो अरब टेलीविजन सेटों पर देखा गया बल्कि सराहा भी गया।

आयोजन की गड़बड़ी को उजागर करने और अकुशलता की कठोर से कठोर आलोचना में लगे देशी और विदेशी सभी मीडिया ने अपना रुख बदलते हुए यह महसूस किया कि अब भारत का दौर आ गया है। इसने बीजिंग 2008 के सटीक सैन्य आयोजन से निराश भारतीयों को यह हौसला दिलाया है कि लोकतंत्र कछुआ चाल से भले चले, लेकिन वह दौड़ जीतने की संभावना बनाए रखता है।

भारतीय क्षमताओं के बारे में एक आशंका प्रबंधन की और दूसरी आशंका सुरक्षा की थी। यह दोनों निर्मूल हो गई हैं। सुरक्षा की आशंका तो अब दुनिया के तमाम देशों में पैदा हो गई है, लेकिन विकासशील से विकसित देशों की पंक्ति में खड़े हो रहे देश को प्रबंधन के मामले में अक्सर संदेह की नजर से देखा जाता है।

इस नाते उन पर अच्छी से अच्छी मेहमाननवाजी करने का कुछ अतिरिक्त दबाव भी रहता है और वे अपनी शान बढ़ाने के लिए वैसा करते भी हैं। हालांकि इस मामले में शादी के रूपक का प्रयोग ढिलाई और अफरातफरी के लिए किया गया, लेकिन उसका प्रयोग बेमिसाल आयोजन के लिए बारातियों के दबाव के तौर पर भी किया जा सकता है। बाद में दुनिया के कई देशों में यह महसूस भी किया गया कि खिलाड़ियों को खेल भावना को ज्यादा महत्व देना चाहिए, भोजन के स्वाद और ब्यूटी पार्लर पर नहीं।

इसका मतलब यह नहीं कि आयोजन की गड़बड़ियों की अनदेखी कर दी जाए। उसे तो ठीक करना ही पड़ेगा, क्योंकि एक सुचारू व्यवस्था से ही हम तरक्की का सफर तय कर पाएंगे, लेकिन उससे भी आगे की बात देश के खेलों में नई ऊर्जा भरने की है। ऐसा न हो कि दिल्ली में केंद्रित यह खेल दिल्ली के ही ढांचे का कायाकल्प बनकर रह जाए।

इस आयोजन की रोशनी और गूंज देश के उन छोटे-छोटे शहरों और कस्बों तक जानी चाहिए जहां तमाम युवा खेल में कैरियर बनाने और देश का नाम रोशन करने के लिए अपना पसीना बहा रहे हैं। लोगों को यह संदेश मिलना चाहिए कि खेल पढ़ाई-लिखाई से कम नहीं है और भारत में खेल का मतलब सिर्फ क्रिकेट नहीं है। अगर हम बेमिसाल आयोजन कर सकते हैं, तो खेलों में नया स्तर क्यों नहीं कायम कर सकते।

हालांकि राष्ट्रमंडल के कई देशों में क्रिकेट एक प्रमुख खेल है, लेकिन वहां बाकी खेलों की उपेक्षा नहीं हुई है। यही सबक भारत को भी सीखना है। वह क्रिकेट का मक्का तो बना रहे, पर बाकी खेलों की ऊर्वर भूमि भी बने। आयोजन का सबसे बड़ा लाभ भारत को यही मिलना चाहिए कि उसके पहले से स्थापित खेल सितारे तो जमे ही रहें, पर तमाम नए खेल नक्षत्रों का भी उदय हो।

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