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कितना कारगर ग्लोबलाइजेशन का असर

कितना कारगर ग्लोबलाइजेशन का असर

अब विदेश जाना हमारे लिए स्वप्न नहीं रहा। बीपोओ और बड़ी-बड़ी कंपनियों ने युवाओं के लिए ऐसे अवसर पैदा किए हैं, जहां बाहर की दुनिया, वहां की जीवनशैली, वहां की भाषा-बोली से उनका निकट संपर्क बन रहा है। छोटी-छोटी कंपनियों के एग्जीक्यूटिव भी विदेशों में ट्रेनिंग के लिए जा रहे हैं। तमाम संभावनाओं के चलते विदेशी भी भारत आ रहे हैं। इससे हमारी जीवनशैली कहां तक बदल रही है, पड़ताल कर रही हैं सुमिता

1991 में अनुराग माथुर का एक उपन्यास प्रकाशित हुआ था ‘द इंस्क्रूटेबल अमेरिकन’। छोटे से कस्बे में रहने वाला गोपाल अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी से साल भर का एक कोर्स करने जाता है। उसकी अंग्रेजी बेहद देसी है और अमेरिका को लेकर उसके अपने पूर्वाग्रह हैं। वह ऐसे रेस्तरां चाहता है, जहां शाकाहारी भोजन किसी ब्राह्मण कुक ने बनाया हो। लड़कियों को लेकर उत्सुक भी रहता है, पर अपने नैतिक संकोच से बाहर नहीं आ पाता। इस उपन्यास में वह अमेरिका से अपनी पहचान बनाने का प्रयास करता है। यह लगभग दो दशक पहले का समय था। पिछले दो दशकों ने हमारी दुनिया को बदलकर रख दिया है। अब अमेरिका या पश्चिमी देश या कहें कि विदेश हमारे लिए असंभव नहीं रह गया है। संचार क्रांति के साथ ही खुले बाजार में बीपीओ व बड़ी-छोटी कंपनियों ने तमाम ऐसे अवसर पैदा किए, जहां बाहर की दुनिया, वहां की जीवनशैली, वहां की भाषा-बोली हमारे जीवन का हिस्सा ही नहीं बनीं, बाहर की वह दुनिया भी हमें ज्यादा पहचानने समझने लगी। यहां के युवाओं को बाहर के देशों में काम करने के अवसर मिले हैं। छोटी-छोटी कंपनियों के एग्जीक्यूटिव सिंगापुर-हांगकांग से लेकर यूरोप व अमेरिका तक ट्रेनिंग के लिए जा रहे हैं। विदेशी एग्जीक्यूटिव तमाम संभावनाओं के चलते भारत आ रहे हैं। नतीजा यह कि संपर्क व्यावसायिक व निजी तौर पर भी बढ़े हैं।

बदलाव दर बदलाव

बैंगलौर में याहू में काम करने वाले गौरव का सफर एक बीपीओ से शुरू होकर एचसीएल होते हुए बहुत जल्दी ही याहू तक पहुंचा है। गौरव का मानना है कि मेरी जिंदगी बहुत जल्दी बहुत से पड़ाव पार कर गई, बहुत से बदलाव के साथ। अमेरिकी संपर्क पिछले सालों में बहुत ज्यादा रहा और इसका सबसे बड़ा फायदा मुङो यह हुआ कि मैंने वर्क कल्चर सीखा। अमेरिकी बहुत ईमानदारी से अपना काम करते हैं। हमारी तरह बेवजह भावुक होना उनकी फितरत नहीं। ज्यादा प्रेक्टिकल हैं और जीना जानते हैं।

मेरा परिवार काम कर पैसा जोड़ने और सादगी भरे जीवन में यकीन रखता आया है। मैं भी एक हद तक सादगी पसंद करता हूं, पर घूमने-फिरने पर मैं पैसा खर्च करने में नहीं झिझकता। हमारे ऊपर वे प्रैशर नहीं हैं जो हमसे पहली पीढ़ी पर थे। मैं चाहता हूं मेरी पत्नी स्मार्ट दिखे, इंग्लिश में बात करे और नई जीवनशैली को अपनाए, पर हम दोनों ही अपनी फैमिली की कभी उपेक्षा नहीं करते। घर में होने वाली पार्टी अब पहले का लंच या डिनर नहीं, उससे कुछ ज्यादा होता है। कुछ हंगामा, कुछ मस्ती के साथ। बाहर खाना खाते समय हम कोशिश करते हैं कि ऐसी जगह हो, जहां बार भी हो। शॉपिंग और शॉपिंग करने के तरीके दोनों बदले हैं। शॉपिंग अब सिर्फ जरूरत से नहीं होती, किसी शाम की आउटिंग का हिस्सा होती है।

हां, बोलने का मेरा एक्सेंट बदला है, मगर इसकी वजह यह थी कि पहले मेरा लहजा ऐसा था कि अमेरिकन्स को समझने में मुश्किल होती थी। जरूरत ने खुद ब खुद मेरे एक्सेंट को बदल दिया। विदेशी भी हमारी जीवनशैली की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

बीपीओ ने बदली भाषा

बीपीओ का जीवन कुछ अलग होता है। टेक्निकल सेक्शन में तो नहीं, पर सेल्स प्रोसेस में एक्सेंट न्यूट्रल रखना होता है, ताकि कस्टमर समझ सके। पर इस तरह के काम से सोशल लाइफ, साथ ही फैमिली लाइफ प्रभावित होती है। फास्ट फूड पर जीवन बीतता है, इसलिए स्वास्थ्य भी बहुत अच्छा नहीं रह जाता। हां, इस काम से एक नई दुनिया से परिचित होने में मदद जरूर मिलती है। पैसा भी अच्छा मिलता है। सुमित गुप्ता मार्केट रिसर्च करने वाली एक कंपनी ग्रीनफील्ड में काम करते हैं, पर बीपीओ में भी काम कर चुके हैं। कहते हैं कि हमउम्र लड़के-लड़कियों के साथ काम करना दफ्तर के वातावरण को संतुलित व दिलचस्प भी बनाता है। यहीं मेरी अपनी लाइफ पार्टनर से मुलाकात हुई। विवाह के बाद हम दोनों ने बीपीओ का काम छोड़ दिया। उनका मानना है कि इन दिनों जिस तरह की हाई डिस्पोजेबल इनकम हो रही हैं, उसने जीने का अंदाज बदल दिया है। वर्किग स्टाइल पहले सा नहीं रहा। अमेरिकन की वर्किंग हैबिट अलग हैं। प्रोजेक्ट पर काम हो रहा हो तो वे 22-22 घंटे काम करते हैं। क्लाइंट ऐसे काम करें तो जाहिर है हमें भी उसी डेडिकेशन से काम करना होता है।

सपना नहीं विदेश

एक एसेट मैनेजमेंट कंपनी में काम करने वाले निशांत को काम से यूरोप और खास तौर से लंदन जाने का मौका मिलता रहा है। हम लोगों को जो विदेश पहले एक सपना लगता था, वह अब अपनी पहुंच में महसूस होता है। निशांत को नहीं लगता कि हमारा पहनने का स्टाइल हाल-फिलहाल विदेश से प्रभावित हुआ है। हम हमेशा से फैशन के लिए पश्चिम से प्रेरणा लेते रहे हैं। अब वही ज्यादा हो गया लगता है। हां, 21-25 आयु वर्ग में हमें यह ज्यादा दिखता है। यह वर्ग कमाता है, खर्चा करता है, खरीदता है और समझता भी है कि क्या करना है क्या नहीं। भविष्य के डर खत्म हुए हैं। क्रेडिट कार्ड कल्चर ने बाजार को बदला है और हमें भी।

अलका राज पिछले लगभग दस साल से ह्यूस्टन, अमेरिका में रह रही हैं। वहां वे कल्चरल ज्यॉग्राफी पढ़ाती हैं। उनका मानना है कि हम भारतीयों ने यहां अमेरिका के लोगों को बदल कर रख दिया है। हमारा मसालेदार नॉन वेज तो है ही, वे समोसे
और ढोकले तक शौक से खाते नजर आ जाते हैं। घर के इंटीरियर के लिए वे भारतीय सामान बहुत पसंद करते हैं। हमारे पारिवारिक रिश्तों का वे बेहद सम्मान करते हैं। वाकई बदलाव सब जगह हैं। छोटे शहरों से आए लड़के-लड़कियां, जिन्हें बातचीत के लिए सही शब्द तलाशने मुश्किल होते थे, आज लंबे सफर पर काफी दूर निकल आए हैं। दूसरी ओर दूर-दराज के कथित विकसित देशों ने हमें निकट से जानना चाहा है। बहुत कुछ बदला, पर बहुत कुछ जटिल भी हुआ है। निशांत के शब्दों में ‘पहले की जिंदगी सिंपल लगती थी, पर अब जीना कॉम्पलिकेटिड हो गया है।’

भारतीय घरों में अमेरिकी स्लैंग
 He’s an ace reporter. 
वह बहुत अच्छा रिपोर्टर है।

The movie was a bomb.
यह बुरी फिल्म थी।

What an awesome sunset.
कितना सुन्दर है सूर्यास्त का दृश्य।

He barfed all over the seat of the airplane.
उसने एयरप्लेन की सीट पर ही उल्टियां कर दीं।

After working all day I am really beat.
सारे दिन काम करने के बाद मैं सचमुच थक गया हूं।

It’s OK. Don’t get so bent. (angry)
ठीक है, पर इतना गुस्सा मत हो।

Don’t get so bent out of shape.
इतना परेशान मत हो।

Shut up! You really have a big. 
चुप रहो! बहुत ज्यादा बात करते हो।

Hey, don’t blow a fuse.
अरे, गुस्सा मत करो।

अमेरिकी हुए फिदा

चिकन टिक्का और बिरयानी का हमने अमेरिकी लोगों को दीवाना बना दिया है। भारतीय रंग उन्हें बेहद पसंद हैं। पोशाक, एक्सेसरीज, ज्वैलरी, घर का  इंटीरियर यानी हर कहीं भारतीय रंग नजर आते हैं। कोई कल्चरल कार्यक्रम हो, तो वे जरूर शामिल होते हैं। हमारे संपर्क से तो वे प्रभावित हैं ही, बॉलीवुड ने भी उन्हें भारत का एक्सपोजर दिया है। वे बॉलीवुड डांस से लेकर क्लासिकल कत्थक व भरतनाट्यम तक की कक्षाओं में नजर आते है। मई 2005 में जब हम अमेरिका पहुंचे, तो बहुत सी आशंकाएं थीं-नया देश, नई संस्कृति। पति अमित जैन नॉदर्न वर्जीनिया में इन्फोसिस में काम करते हैं। यहां भाषा परिचित थी, पर संवाद की स्थिति बन पाएगी कि नहीं, यह डर बना हुआ था। पर बेहद अपनेपन से अमेरिका ने हमें स्वीकार कर लिया। हां, अंग्रेजी लहजा समझने में जरा दिक्कत हुई, पर वे देख कर हैरान होते थे कि कोई भारतीय धाराप्रवाह अंग्रेजी भाषा बोल सकता है।  बर्गर, टैकोज (मैक्सिकन फास्ट फूड), कुछ अलग स्वाद की चीज। विशाल मॉल, बड़ी इमारतें, दुनिया भर के व्यंजन-इटैलियन, थाई, इथियोपियन, मैक्सिकन। जगह धीरे-धीरे अपनी होती गई। दूसरी ओर भारतीय यहां अमेरिकी ही हो गए है। पर फिर भी यहां खुद को अजनबी नहीं लगता।  
दीपिका जैन

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