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विश्वास का दुश्मन है संदेह

विश्वास का दुश्मन है संदेह

किसी जानवर में अविश्वास करनेवाला तोलू मन नहीं होता कि वह तुलना करे। हिरण कभी यह नहीं सोचता कि 'मैं शेर की तरह बहादुर क्यों नहीं हूं?' उसके मन में इस प्रकार का विचार नहीं आता, इसलिए वह खुश रहता है। संदेह विश्वास का वह दुश्मन है, जो दोस्ती की नकाब में अपने दोस्त का धीरे-धीरे खात्मा करता है।

इंसान के अंदर ही ईर्ष्या, तुलना, अविश्वास और दु:ख का विचार आता है, वरना दुख की आवश्यकता ही नहीं थी। दुख की वजह से इंसान के अंदर विश्वास डोलता रहता है और सफलता से उसकी दूरी बढ़ती जाती है। वरना स्वयं में विश्वास महसूस करना कठिन नहीं है। सिर्फ पूर्ण ज्ञान न होने की वजह से इंसान के अंदर विश्वास दबा हुआ रहता है और कभी-कभी ही प्रकट होता है।

विश्वास की आवश्यता आज हर इंसान को इसलिए है, क्योंकि यह अपने अंदर जाने का मार्ग तैयार करता है, 'न-मन' होने का मार्ग तैयार करता है। हमारा यही मन बाहर भी जा रहा है और यही मन अंदर भी आ रहा है। जिस पाइप से पानी बाहर जा रहा है, उसी पाइप से पानी अंदर भी आ सकता है। पानी के अंदर या बाहर जाने के लिए पाइप तो एक ही है। जिस तरह मन से विश्वास अंदर जाता है, उसी तरह मन से वह बाहर भी आ सकता है।

'विश्वास' एक ऐसी चीज है जो मन से हमारे शरीर द्वारा बाहर झांक रहा है। हर इंसान वही विश्वास प्रकट करना और खोलना चाहता है। थोड़ा भी विश्वास खुला तो हमें आनंद आता है, हमें अपने जीवन में चमत्कार दिखाई देते हैं। कोई घटना होने के बाद हम कई बार लोगों को ऐसी पंक्तियां कहते हुए सुनते हैं कि 'मुझे पक्का विश्वास था कि यह होनेवाला है, मुझे मालूम था।' यह विश्वास उन्हें कैसे था? इसका अर्थ है कि उनमें विश्वास तो जागा था, पर कहीं उनके मन में थोड़ा सा संदेह था, इसलिए वे यह बात किसी को बता नहीं पाए थे। संदेह विश्वास का वह दुश्मन है, जो दोस्ती की नकाब में अपने दोस्त का धीरे-धीरे खात्मा करता है।

हर एक के अंदर विश्वास है, प्रकट भी हो रहा है मगर कुछ जगहों पर ही प्रकट हो पा रहा है। थोड़ा विश्वास प्रकट होने से भी कितना आनंद आता है। जब भी आप यह पंक्ति कहते हैं कि 'अरे! मुझे पक्का मालूम था कि ऐसा ही होनेवाला है' तब आपको अपने अंदर से कितना आनंद मिलता है, कितना अच्छा लगता है।

यदि आप यह सर्वेक्षण करके देखें, हर एक से पूछें कि 'क्या आप में विश्वास है?' तो विश्व का एक भी इंसान यह नहीं कहेगा कि मुझे विश्वास नहीं है, सभी में विश्वास है। किसी को ईश्वर के होने में विश्वास है तो किसी को उसके न होने में विश्वास है। विश्वास तो दोनों में है और दोनों का उसका फल मिल रहा है। जो जैसा विश्वास रखता है, उसे वैसा फल मिलता है।

यदि आप यह विश्वास रखते हैं कि कोई काम आप कर सकते हैं या वह काम आप नहीं कर सकते तो दोनों अवस्थाओं में आपके अपने विश्वास अनुसार फल मिलता है। विश्वास रखनेवाला बाधाओं के बावजूद भी देर सवेर अपना काम पूरा करता है। विश्वास न रखनेवाला छोटी बाधा से भी काम को रोक सकता है।

विश्वास सभी के अंदर है पर उसे प्रकट होने का मौका नहीं मिलता है। विश्वास प्रकट होगा तो उसके परिणाम आएंगे। आप अपने आपसे पूछें कि 'आपके अंदर कितना प्रतिशत विश्वास प्रकट हुआ है? कितना प्रतिशत खुला है?' अगर खुला है तो आपके जीवन में चमत्कार चल ही रहे हैं। नहीं खुला है तो समझें कि अभी उसके खुलने के लिए कुछ काम होना बाकी है। विश्वास इंसान की सबसे बड़ी ताकत है। पूरे विश्व में कहीं पर जो भी चमत्कार हो रहे हैं, वह विश्वास की शक्ति की वजह से ही हो रहे हैं। हर एक के अंदर विश्वास है, परंतु क्या वह विश्वास उसे आत्मसाक्षात्कार दिलाएगा, तेज सफलता दिलवाएगा यह वह लक्ष्य देगा, जो करने के लिए वह पृथ्वी पर आया है?

विश्वास सभी में है और सभी में कुछ न कुछ मात्रा में प्रकट हो रहा है, फिर वह बल, कुर्सी या पैसे की वजह से ही क्यों न हो।

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