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काश! उस सुझाव को मान लेते

अयोध्या का फैसला आ गया है। हालांकि आने वाले महीनों में इसके खिलाफ अपील होगी यानी एक और फैसला आएगा, लेकिन हमें तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

पहली बात भारतीय राजनेताओं के बारे में है। यहां हमें यह मानना चाहिए कि पहली बार उन्होंने इस तरह से व्यवहार किया है कि जिससे अपने देश की साख बढ़ी है। अयोध्या विवाद के बारे में पहले कई मौकों पर राजनेताओं का रिकॉर्ड शर्मनाक और निंदनीय रहा है।

अयोध्या विवाद को सभी प्रमुख दलों ने धधकाया, महज इसलिए एक विभाजनकारी मुद्दा बन गया क्योंकि इसके माध्यम से भाजपा अपना भविष्य बनाना चाहती थी। राजनेताओं ने इस बात की परवाह ही नहीं की कि इस मुद्दे से बेगुनाह जनता का कितना नुकसान होगा।

लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा ने सांप्रदायिक तनाव फैलाया और उसके चलते दंगे हुए। निश्चित तौर पर उनकी आंखों के सामने जो विध्वंस हुआ, उसने भारत को विभाजित कर दिया। मुलायम सिंह यादव ने अयोध्या का इस्तेमाल मुसलमानों को बेचैन करने और उनमें असुरक्षा की भावना जगाने में किया। नरसिंह राव की कांग्रेस सरकार में 1991 से 1996 तक गरिमाहीन तरीके से व्यवहार किया।

राव मस्जिद की सुरक्षा करने में विफल रहे। उन्होंने कारसेवकों के प्रति हाथ पर हाथ धर कर बैठने (या धूर्ततापूर्ण, जो आपके सोचने पर निर्भर करता है) वाला रवैया अपनाया और जब मस्जिद विध्वंस के बाद देश जल रहा था, तो उनको काठ मार गया।

लोगों की जान की हिफाजत करने और दंगा रोकने में उनकी सरकार की विफलता के अंकुर हम इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 के उस दंगे में भी देख सकते हैं, जब राव देश के गृहमंत्री थे। उस समय नरसिंह राव ने उसका दोष कहीं और मढ़ दिया था, लेकिन उनकी संवेदनहीनता और अक्षमता 1992-93 में क्रूर तरीके से प्रकट हो गई।

इस बार हमारे राजनेताओं ने जैसी प्रतिक्रिया जताई, वह उनके दो दशक पहले के व्यवहार के एकदम विपरीत है। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने उन सभी लोगों को सुरक्षा की गारंटी देने का प्रशंसनीय काम किया, जिन्हें फैसले के बाद किसी भी तरह का खतरा महसूस हो रहा था।

सरकार ने जनसंचार माध्यमों और फिल्मी स्टारों के माध्यम से लोगों के फैसले के प्रति संयत रहने का अभियान भी चलाया। इस बार भाजपा ने भी संयमित प्रतिक्रिया जताई। वरिष्ठ नेता लगातार अदालत के फैसले का सम्मान करने के लिए अपने समर्थकों से अपील करते रहे और कई दिग्गज नेताओं ने टेलीविजन पर शांति का आह्वान भी किया।

दूसरी बात यह है कि 1980 के दशक में जब पहली बार यह विवाद केंद्रीय मुद्दा बना था, तब से अब तक भारत काफी बदल चुका है। मैंने पिछले रविवार को अपने ब्लॉग में लिखा था कि फैसला चाहे जो हो, भारत आगे बढ़ गया है और ज्यादातर भारतीयों के बीच अब अयोध्या की अनुगूंज नहीं है। हालांकि जब मैं वह टिप्पणी लिख रहा था तो मैंने सोचा था कि कहीं मैं अतिरिक्त आशावादी तो नहीं हो रहा हूं। क्या दोनों समुदाय सचमुच इतना आगे बढ़ गए हैं?

आखिर मैंने तय किया कि मैं अपने आशावाद को दर्ज करूंगा। मेरा विचार था और है कि अयोध्या भारतीयों के उस नाकाम मानस पर जताई गई एक प्रतिक्रिया थी, जो 1980 के दशक के अंतिम दौर में भारत पर मंडराता रहा। वह अपने देश के लिए एक कठिन दशक था। विद्रोह, दंगों और हत्याओं से घिरे उस दशक में हम सभी क्रोधित और पराजित थे।

जब कोई व्यवस्था ढहती हुई दिखती है, तो लोग उन आदिवासी और धार्मिक अस्मिताओं की ओर लौटने लगते हैं, जो व्यवस्था बनने के पहले मौजूद थी। सन् 1947 के बाद पहली बार हिंदू अपने को धार्मिक के बजाय राजनीतिक समुदाय समझने लगे थे।

भारत की विफलता के प्रति उनकी जो कुंठा थी, वह भारतीय धर्मनिरपेक्षता के प्रति गुस्से के तौर पर प्रकट हुई थी। क्या यह हिंदुओं को अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक के तौर पर समझी जाने वाली धारणा नहीं बन गई थी? क्या कांग्रेस हमेशा मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथी तत्वों की बातें इसलिए नहीं मान लेती थी कि ये तत्व मुसलमानों का वोट एकमुश्त दिला सकते हैं? इसी तरह की तमाम और बातें भी रही हैं।

अस्सी के दशक के मध्य तक व्यापक हिंदू समाज ने बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि विवाद के बारे में सुना तक नहीं था, लेकिन दशक के अंत तक यह हिंदुओं पर हुए अत्याचार का प्रतीक बन गया। राम के जन्मस्थान पर एक मस्जिद! मुसलमान हिंदुओं की सबसे पवित्र भूमि उन्हें वापस करने से इनकार कर रहे हैं! और सरकार उनका समर्थन कर रही है!

उसके बाद सन् 1991 में सरकारी तौर पर भारत दिवालिया हो गया था। वह बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास अपना सोना गिरवी रखने के लिए मजबूर और विदेशियों की दरियादिली पर निर्भर था। राष्ट्रीय पराजय और अवसाद  की इसी पृष्ठभूमि में अयोध्या आंदोलन अपने चरम पर पहुंचा और मस्जिद गिराई गई।

इन दिनों 8.5 प्रतिशत की वृद्धि दर और चारों तरफ आशावादी मानस के चलते उस युग की निराशा विस्मृत हो चुकी है। भारत की सफलता का एक परिणाम यह हुआ है कि हम अपने देश में फिर विश्वास करने लगे हैं। 

हम अभी भी व्यवस्था की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन यह भी मानते हैं कि हम सब नए भारत की संतान हैं, न कि हिंदू, मुस्लिम, सिख वगैरह या पंजाबी, तमिल, गुजराती और बंगाली वगैरह हैं। आदिवासी और धार्मिक अस्मिताएं विलीन हुई हैं। इसी तरह वह भावना भी विलीन हुई है, जिसने अयोध्या आंदोलन को हवा दी थी। 

एक निराशावादी देश नफरत में संतोष प्राप्त करता है। जो देश महानता के रास्ते पर बढ़ रहा है, वह कभी भी विध्वंस, अराजकता और खून- खराबे का खतरा नहीं उठाता। वह जानता है कि इससे वह बहुत कुछ खो देगा। इसीलिए इस फैसले से ज्यादातर भारतीयों पर खास फर्क नहीं पड़ा।

आखिर में मैं तीसरी बात जो कहना चाहता हूं, वह अयोध्या आंदोलन के आरंभिक दौर में उठी थी। यह सुझाव लालकृष्ण आडवाणी सहित भाजपा के कुछ नेताओं की तरफ से भी आया था। वह बाबरी मस्जिद को हिंदुओं की मदद और खर्चे से हूबहू किसी और जगह पर ले जाने का सुझाव था। ऐसा बांध या सड़क के मार्ग में धार्मिक इमारत आने पर कई मुस्लिम देशों में किया जाता है।

मुसलमानों का कहना है कि किसी ने यह प्रस्ताव गंभीरता से नहीं रखा। जबकि मुझे ऐसे प्रस्ताव की याद आती है। अगर उस समय दोनों पक्षों ने थोड़ी विशाल हृदयता दिखाई होती, तो तमाम जीवन बच जाते और भारत एक भयानक और बेवजह संत्रास से।       

लेखक एचटी मीडिया के संपादकीय सलाहकार हैं।

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