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उर्दू मीडिया: गलती तलाशने का दौर शुरू

इस मसले को लेकर कोर्ट में साठ बरस तक सुनवाई का उबाऊ दौर चला, जिसकी वजह से मुल्क की पेशानी पर मुंबई ब्लास्ट और गुजरात दंगे के काले धब्बे लगे, सांप्रदायिक दंगों के लंबे दौर में अरबों का नुकसान झेलना पड़ा और हजारों बेकसूरों को अपनी जान गंवानी पड़ी। उसी विवादास्पद मसले पर कोर्ट का फैसला आने के बाद अमन-शांति की दीवार न दरके।

कहीं से किसी अप्रिय घटना की छोड़िए मस्जिद-मंदिर के नाम पर छींटाकशी तक की खबर सुनने को न मिले। इससे लगता है विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भारत पूरी तरह परिपक्व हो चुका है। कॉमनवेल्थ गेम्स के चलते बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के फैसले को लेकर मुल्क की सांसें अटकी हुई थीं।

मारे भय से उन प्रदेशों का भी बुरा हाल था, जिनके सीने पर मंदिर विवाद ने सांप्रदायिक दंगे के गहरे जख्म दिए हैं। लेकिन यह घड़ी बेहद शांति से गुजर गई। मीडिया ने भी मुंबई ब्लास्ट और गुजरात दंगे जैसी हड़बड़ी नहीं दिखाई। अखबारों में आने वाले बयान से आभास होता है कि कोर्ट के फैसले से कमोबेश सभी पक्ष संतुष्ट हैं। 

मुंबई का ‘इंकलाब’ कहता है- फैसला मसलेहतों वाला है। जजों ने सभी की भावनाओं और धार्मिक आस्थाओं का ख्याल रखा। जिस पक्ष को फैसले पर थोड़ा भी ऐतराज है, वह सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है। अपने अखबार में मासूम मुरादाबादी लिखते हैं-कई दिनों के तनाव के बाद लोगों को राहत मिली है। सभी को अंदेशों ने घेर रखा था।

उर्दू मीडिया ने फैसले पर सीधी टिप्पणी करने से परहेज किया है, लेकिन उसे इस बात का बेहद मलाल है कि सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील कोर्ट में अपना पक्ष और तमाम सबूत मजबूती से रखने में असफल रहे। जिस मस्जिद को लेकर तकरीबन साढ़े तीन सौ सालों से दावा किया जाता रहा है, उसका एक बड़ा हिस्सा उनके हाथ से निकलता दिखाई दे रहा है।

ऐसे में किसी अखबार को बोर्ड की भूमिका पर संदेह होने लगा है, तो कोई यह मान चुका है कि धनाभाव के चलते काबिल और चुनिंदा वकीलों की पैरवी न होने से हाईकोर्ट ने उसके दावों को खारिज कर दिया। ‘सहाफत’ अपने संपादकीय ‘न कोई जीता न कोई हारा’ में कहता है- बोर्ड अपना दावा साबित करने में क्यों नाकाम रहा, देर-सवेर यह खुलकर सामने आ जाएगा।

बोर्ड के वकीलों की खिल्ली उड़ाते हुए अखबार कहता है- वे अदालत में यह तक साबित नहीं कर पाए कि बाबरी मस्जिद शहंशाह बाबर ने बनवाई थी या उसके सिपहसालार मीर बकी ने। ‘सियासत’ कहता है- सुन्नी वक्फ बोर्ड सुनवाई शुरू होने के 13 साल बाद इसे लेकर सरगर्म हुआ।

‘रोजनामा सहारा’ जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी के हवाले से कहता है मिल्कियत को लेकर कभी किसी पक्ष ने कोर्ट में भूखंड के विभाजन की मांग नहीं उठाई थी। इसके बावजूद काबिल जजों ने दोनों समुदायों के जज्बातों और आस्था के नाम पर विवादित भूखंड के तीन हिस्से कर उनके बीच बांट दिए।

अखबार ने बोर्ड के वकीलों की फैसले से पहले माननीय जजों को अपनी दलीलों से साबित नहीं कर पाने पर खिंचाई की है कि मिल्कियत के फैसले भावनाओं के बिना पर नहीं सबूतों के आधार पर दिए जाते हैं। हाई कोर्ट से असहमति जताते हुए सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का ऐलान किया है।

इस पर ‘जदीद खबर’ का सुझाव है कि बोर्ड इस बार पुरानी गलतियां न दोहराए। सुप्रीम कोर्ट में जाने से पहले वक्फ बोर्ड, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी माहिर वकीलों का इंतजाम कर लें। कोशिश की जाए कि इस दफा उनके दावे आर्थिक तंगी की वजह से कोर्ट में कमजोर न पड़ें।

अखबारों की राय में देश की धर्मनिरपेक्षता बचाये रखने के लिए बोर्ड का सुप्रीम कोर्ट जाना बेहद जरूरी है। उर्दू मीडिया सशंकित है कि मुस्लिमों ने फैसला स्वीकार लिया तो कट्टरपंथी उनके दूसरे मजाहबी स्थलों पर दावेदारी को लेकर सरगर्म हो जाएंगे।

वैसे बॉलीवुड की नामचीन हस्ती जावेद अख्तर ऐसे अंदेशों को खारिज करते हुए मुंबई के एक अखबार में कहते हैं- जिंदगी में चीजें जैसी होनी चाहिएं, वह अक्सर नहीं होतीं। जिसे जितना मिल जाए, उससे संतोष करना बेहतर रहता है। ‘हमारा मकसद’, ‘एक तारीखसाज फैसला’ में कहता है- सभी पक्ष फैसला कबूल लें तो इस लंबे विवाद का पटाक्षेप हो जाए। ज्यादा पाने की इच्छा है तो धार्मिक नेता सिर जोड़कर बैठें और मसले का हल कोर्ट से बाहर ढूंढ़ने की कोशिश करें। फैजाबाद का ‘अपनी ताकत’ में लिखता है- देशभक्त होने के लिए हमें देश के कानूनों और अदालतों पर भरोसा करना ही होगा।

लेखक हिन्दुस्तान से जुड़े हैं

malik_hashmi64@yahoo.com

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