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नई तकनीक से चमकता कॉमनवेल्थ

कॉमनवेल्थ खेलों में टेक्नोलॉजी और साइंटिफिक ट्रेनिंग का जोरदार प्रभाव देखने को मिलेगा। यह पहली बार होगा कि भारत में और कॉमनवेल्थ खेलों की विभिन्न स्पर्धाओं का हाई डेफिनिशिन प्रसारण किया जाएगा। खेलों में टैक्नोलॉजी और साइंस की पैठ का आलम यह है कि कॉमनवेल्थ खेलों की क्वींस बेटन भी जीपीएस सिस्टम से जुड़ी है। वह अपने चाहने वालों के संदेश भी मोबाइल नंबर के जरिए एसएमएस से प्राप्त करती है।

खेलों के सटीक परिणाम के लिए इस बार विश्व प्रसिद्ध टिसोट कंपनी को अनुबंध दिया गया है। यह कंपनी खेलों की आधिकारिक टाइमकीपर है। इसके जरिए खेलों में भाग ले रहे लगभग सात हजार एथलीटों का सारा डाटा एक बटन दबाते ही उपलब्ध हो जाएगा।

साइकिलिंग, एथलेटिक या तैराकी में अब इस विवाद में समय बर्बाद नहीं होगा कि टाइट फिनिश में कौन किस नंबर पर रहा। एथलेटिक के लिए फ्लाई कैम होंगे तो तैराकी में पानी के अंदर की तस्वीर लेने के लिए क्रॉल कैम, पोल कैम और टर्न कैम लगाए जाएंगे। मैराथन दौड़ को हेलीकॉप्टरों में लगे विशेष कैमरों से कवर किया जाएगा।

टिसोट के चेयरमैन और मुख्य कार्यकारी अधिकारी क्रिस्टोफ बर्टहोड ने दावा किया कि ‘खिलाड़ियों की जीत-हार के रिजल्ट देने के लिए हमारा सिस्टम ऐसा है कि इसमें रिजल्ट एकदम से एक माइक्रो सेकेंड के अंदर टेलीविजन और इंटरनेट पर फ्लैश हो जाएंगे। सभी स्टेडियमों के रिजल्ट सिस्टम को एक-दूसरे से जोड़ने के लिए एक डाटा सेंटर बनाया गया है। इसमें हर आयोजन स्थल से रिजल्ट की सूचनाएं आ जाएंगी। किसी भी खेल में विजेता का पता लगाने में चंद सेकेंड ही लगेंगे।’

दूरदर्शन के सीनियर प्रोड्यूसर अनुराग दर्शन के अनुसार, ‘ऐसा प्रसारण भारत में पहले कभी नहीं हुआ है। एक डेढ़ साल से हम लोगों की ट्रेनिंग विदेशी विशेषज्ञों के जरिए हुई है। पहली बार हाई डेफिनिशन प्रसारण होगा। देखने वालों को मजा जा जाएगा।’

हॉकी के पूर्व ओलंपियन और हाकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार की माने तो हॉकी में बहुत कुछ उन्होंने अपने पिता से नहीं, खिलाड़ियों को खेलते हुए देखकर ही सीखा है। इससे अंदाजा हो सकता है कि टीवी पर खेलों का उच्चस्तरीय टैक्नोलॉजी वाला प्रसारण देखकर उन  करोड़ों उभरते खिलाड़ियों को कितना फायदा होगा।

खेल अब महज खेल नहीं रह गए हैं। टेक्नोलॉजी और साइंस अब खेलों का अहम हिस्सा बन गए हैं। खेलों में खिलाड़ियों द्वारा जो नित नए कारनामे किए जा रहे हैं, उनमें साइंस और टैक्नोलॉजी का बहुत योगदान रहता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं बल्कि स्कूली स्तर पर भी खिलाड़ियों को साइंस और टैक्नोलॉजी की मदद से ट्रेनिंग दी जाने लगी है।

खिलाड़ियों और खेल अधिकारियों के लिए यह जरूरी हो गया है कि उन्हें टैक्नोलॉजी और साइंस का अच्छा ज्ञान हो। क्योंकि टैक्नोलॉजी के ज्ञान से खिलाड़ियों को जहां अपने और विपक्षी खिलाड़ियों के बारे में सटीक जानकारी आसानी से उपलब्ध हो जाती है, वहीं बतौर खिलाड़ी अपने प्रदर्शन में सुधार के लिए दुनिया भर में हो रहे नए-नए प्रयोगों से जो मदद मिलती है वह लाजवाब होती है।

अगर साइंस की बात करें तो निचले स्तर पर भी अब खिलाड़ियों को ट्रेनिंग के लिए साइंस की मदद लेने पर जोर दिया जा रहा है। यह साइंस की वजह से ही संभव हो सका है कि एक छोटे से और कम कीमत के टेस्ट से यह पता लगाया जा सकता है कि किसी बच्चों में किन खेलों में चमकने के जींस हैं। इससे माता पिता और कोच बच्चों को उनके जींस के हिसाब से खेलों में डालकर बेहतर परिणाम हासिल कर सकते हैं।

खेलों में साइंस के दखल से ही यह जानना संभव हो सका है कि खिलाड़ी मैदान में फिट रहने के लिए क्या -क्या खुराक लें, जिससे उनका स्टेमिना भी बना रहे और भूख भी मिट जाए। ऐसे-ऐसे एनर्जी ड्रिंक्स उपलब्ध हैं जो मैदान में जमकर पसीना बहा रहे खिलाड़ियों के शरीर में नई स्फूर्ति पैदा कर देते हैं।

यह साइंस की वजह से ही संभव हो पाया है कि डोपिंग की मदद से अपने शरीर की ताकत बढ़ा रहे खिलाड़ियों का बचना मुश्किल हो गया है। विश्व एंटी डोपिंग एजेंसी (वाडा) के महानिदेशक डेविड होमैन का कहना है कि, ‘खेलों में साइंस की वजह से ड्रग्स का सेवन करने वाले एथलीट भरपूर फायदा उठा रहे हैं और हम उन्हें पकड़ने के जो तरीके इजाद करते हैं वे उससे कहीं आगे निकलकर बचने के तरीके खोज लेते हैं। इसके लिए वे साइंटिस्टों को मोटी धनराशि दे रहे हैं।’

यह तय है कि इस बार के कॉमनवेल्थ खेल टेक्नोलॉजी और साइंटिफिक दृष्टिकोण से भारतीय खेल जगत में मील का पत्थर साबित होंगे। जो आधुनिक स्टेडियम बने हैं और उसमें जो दुनिया की सर्वश्रेष्ठ सुविधाएं उपलब्ध हैं वह भारतीय खिलाड़ियों के लिए अनूठा तोहफा साबित होंगी।

विज्ञान और तकनीकी का अनोखा मेल
-दुनिया का एक अनोखा त्यागराज स्टोडियम बनाया गया, जिसमें विज्ञान और तकनीक का बेहतर इस्तेमाल किया गया है।
-भारत का पहला ग्रीन स्टेडियम है त्यागराज।
-स्टेडियम का निर्माण 28 लाख फ्लाई एश ईंट से किया गया है।
-स्टेडियम में ऐसे शीशों का प्रयोग किया गया है जो बाहर धूप की गर्मी को अन्दर आने से रोक लेता है।
-रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम मोजूद है।
-पानी को रिसाइकल करने की भी तकनीक।
-कूड़ा निष्पादन तकनीक मौजूद।
-कुर्सियां ऐसी जो दीवारों में समा जाय, इसमें दो बटन होते हैं जिससे ये खुलते और सिकुड़ते हैं।
-पूरे स्टेडियम की बिजली खर्च का इंतजाम भी स्टेडियम का खुद का है। इसके लिए सोलर और गैस टर्बाइन से बिजली पैदा करने की तकनीक लगाई गई है।
-गैस टर्बाइन से निकले धुएं का इस्तेमाल भाप सोखने वाली मशीन द्वारा एयर कडिशनिंग में किया जाता है।
-दुनियाभर के 160 देशों में कॉमनवेल्थ खेल के प्रसारण के लिए दूरदर्शन ने उच्च क्वालिटी और तकनीक से लैस प्रसारण की व्यवस्था की है जो साफ तस्वीर और आवाज उपलब्ध कराने में सक्षम होगा।
-सुरक्षा व्यवस्था में बुलेट प्रूफ एक ऐसी गाड़ी एलएटीसी तैनात है जिसमें 10 कमांडो एक साथ तैनात होंगे और रखेंगे आस-पास की गतिविधियों पर पैनी नजर। इस गाड़ी पर न तो गोली और न ही बम का कोई असर होगा।
-खेल के परिणाम घोषित करने के लिए हाई स्पीड कैमरा लगे हैं जो महज एक माइक्रो सेकेंड में खेल परिणाम टीवी और इंटरनेट पर उपलब्ध कराएंगे।
-दिल्ली पुलिस मुख्यालय में डिजिटल वीडियो वॉल लगाए गए हैं जिससे अलग-अलग स्थानों के नियत समय के वीडियो फुटेज प्राप्त किए जा सकेंगे और इससे खेल स्थलों पर पैनी निगाह रखने में मदद मिलेगी।
-दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स दुनिया में पहला ग्रीन कॉमनवेल्थ गेम्स है।
सौरभ सुमन

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