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आलसियों के क्लब में ‘जिगर’

आलसियों के क्लब में ‘जिगर’

उर्दू के महान शायर ‘जिगर’ मुरादाबादी की मृत्यु को पचास वर्ष हो चुके हैं, लेकिन उनका सम्मान और लोकप्रियता अब भी वैसी ही है। प्रकाश पंडित ने उनके बारे में लिखा है कि ‘आधुनिक उर्दू गज़ल के बादशाह कहे जाने वाले जिगर मुरादाबादी उन महान और सौभाग्यशाली शायरों में से थे जिनका कलाम उनकी जिंदगी में ही क्लासिकल शायरी का हिस्सा बन गया था।’

जिगर का सम्मान तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू से लेकर आम आदमी तक में था। इतनी व्यापक लोकप्रियता के बावजूद जिगर साहब निहायत सरल, फक्कड़ और सूफियाना स्वभाव के बने रहे। उनकी शायरी का लालित्य, मानवीयता दार्शनिक गहराई और आध्यात्मिकता जहाँ उन्हें ऊँचे दर्जे का शायर बनाती है, वहीं आम लोगों की जुबान पर भी उनका रंग चढ़ गया।

मिर्जा गालिब के अलावा वे दूसरे उर्दू शायर हैं जिनके शे‘र आम बोलचाल में मुहावरे की तरह प्रचलित हैं। यहाँ हम उनकी जिंदगी का एक दिलचस्प प्रसंग दे रहे हैं जो हमने उन पर साहित्य अकादमी से छपे मोनोग्राफ से लिया है।

अंजुमन-उल-कुहला
जिगर ने एक बार अपने अंतरंग मित्रों के मनोरंजन और हास-परिहास के उद्देश्य से एक समिति का गठन किया, जिसका नाम ‘अंजुमन-उल-कुहला’ रखा। प्रत्येक निठल्ला व्यक्ति इसका सदस्य हो सकता था। जो व्यक्ति जितना अधिक सुस्त और अहदी सिद्ध होता, उतना ही बड़ा पद उसे दिया जाता।

इसका विवरण इस प्रकार है कि 1932 में जिगर भोपाल गए और कई मास तक अपने एक घनिष्ठ मित्र और अंतरंग साथी महमूद अली खाँ जामई के निवास-स्थान पर रहे। यहाँ हर समय लोग जिगर से मिलने आते थे। इनमें से कुछ गहरे मित्रों ने यह निश्चय किया कि मनोरंजन और हास-परिहास द्वारा समय व्यतीत करने के लिए एक अंजुमन बना ली जाए और उसके सहारे स्वच्छन्दता और अनौपचारिकता के मुक्त वातावरण में समय व्यतीत किया जाए।

अत: तत्काल इस विचार को कार्यरूप में परिणत किया गया और एक समिति का गठन किया गया, जिसका मूल उद्देश्य निठल्लेपन को बढ़ावा देना और उसका प्रचार करना निश्चित हुआ। तदनुसार इसका नाम ‘अंजुमन-उल-कुहला’ रखा गया। इसका मुख्य कार्यालय वह कमरा था, जिसमें जिगर साहब रहते थे। इस कमरे का नाम ‘दारुल कुहला’ तय पाया गया। इसके उद्देश्यों की व्याख्या इन शब्दों में की गयी थी -

आजकल दुनिया कलह और संघर्ष का क्षेत्र बनी हुई है। जिधर देखो रक्त-पात, आतंक और विनाश का बोलबाला है। यदि इसके कारणों पर ध्यानपूर्वक विचार किया जाए, तो पता चलेगा कि यह सब गति की तीव्रता का परिणाम है। आरम्भ में मनुष्य पैदल चला करता था। फिर, चलने में असमर्थ लोगों के लिए सवारी का प्रचलन हुआ। इसके बाद इसका अनुचित प्रयोग होने लगा।

पहले बैलगाड़ी का चलन हुआ। उसका स्थान घोड़ागाड़ी ने ले लिया। फिर तो भाप और बिजली से चलने वाली सवारियाँ ताबड़तोड़ मैदान में आ गयीं। बाइसिकल ने मोटर-कार का रूप ले लिया। रेलें दौड़ने लगीं। समुद्र के सीने को चीरते हुए जहाज और वायु के पंखों पर उड़ते हुए वायुयान घूमने लगे। यहाँ तक कि अब तो बड़ी सरलता से यह सम्भव हो गया है कि प्रात:काल का नाश्ता हम दिल्ली में करें और मध्याह्न् का भोजन हम तेहरान में लें।

पुराने समय में यदि कोई शत्रु आक्रमण करता था तो, उसे गन्तव्य तक पहुँचते-पहुँचते कम-से-कम एक माह अवश्य लग जाता था। इस बीच जिस देश पर आक्रमण होने वाला होता था, उसे तैयारी का अवसर मिल जाता था। किन्तु आज तो यह स्थिति है कि प्रात: 5 बजे अल्टीमेटम दिया और 8 बजे उस देश पर बम वर्षा आरम्भ कर दी। यह सब तीव्र गति का चमत्कार है। अत: शान्तिप्रिय लोगों को इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए गतिहीनता का प्रचार करना अर्थात् ‘सुस्ती’ को बढ़ावा देना चाहिए।

इसकी बैठक प्रतिदिन 9 बजे रात्रि से प्रात: 3 बजे तक होगी। इस समिति के निम्नलिखित चार पदाधिकारी थे—
1. सदर उल-कुहला1— जिगर मुरादाबादी
2. नायब सदर2— हसरत लखनवी
3. नाज़िम उल3-कुहला— महमूद अली खाँ जामई
4. नक़ीब4 उल-कुहला (Sergeant at Arms) गु़लाम़ हुसैन खाँ ‘अज्म’ बनारसी।
जिगर को अध्यक्ष के गरिमापूर्ण पद पर इसलिए आसीन नहीं किया गया था कि वह अपने गुणों और काव्य-प्रतिभा के कारण सब में श्रेष्ठ थे बल्कि उनका चयन इसलिए किया गया था कि वह सुस्ती की परीक्षा में प्रथम श्रेणी में सफल हुए थे। इसलिए ग़ुलाम हुसैन को भारी-भरकम शरीर, सिपाहियों जैसे रोबीले क़द-काठी और कड़कदार आवाज़ के कारण अंजुमन उल-कुहला का चौबदार बनाया गया था। इनका काम समिति के मामलों और अध्यक्ष महोदय के आदेशों की उच्च स्वर में घोषणा करके समिति के सदस्यों को सूचित करना था।

इनके अतिरिक्त लगभग 21 सदस्यों की एक कार्यकारिणी समिति थी। इनमें से प्रत्येक व्यक्ति को उसकी निजी विशेषताओं के आधार पर भिन्न-भिन्न उपाधियों से विभूषित किया गया था। जैसे एक सज्जन छोटे क़द के थे। उन्हें ‘फ़ित्नत : उल-कुहला’ की उपाधि दी गयी थी। एक साहब लम्बे क़द के थे, उनको ‘तवील-उल-कुहला’ की उपाधि दी गयी थी। एक सज्जन शक्कर के अधिक शौक़ीन थे, उनको ‘क़न्द उल-कुहला’ और एक व्यक्ति बहुत भारी शरीर के थे, उनको ‘दबीज़ उल-कुहला’ की उपाधि से विभूषित किया गया था।

चूँकि पूरी उपाधि को मुख से उच्चरित करना सुस्ती की मूल भावना के विरुद्ध था। इसलिए उसके केवल आधे भाग का ही उच्चारण किया जाता था, जैसे सदरूल, दबीजु़ल, नक़ीबुल, कन्दुल आदि। प्रत्येक सदस्य के लिए यह आवश्यक था कि वह प्रतिदिन बैठक में सम्मिलित हो। अत: भारी-से-भारी और मूसलाधार वर्षा में भी लोग इसमें भाग लेने के लिए चले आते। इस पूरे गिरोह में सबसे अधिक आकर्षक और केन्द्रीय व्यक्तित्व जिगर का था। अत: उनके भोपाल से चले जाने के बाद इस समिति की गतिविधियाँ समाप्त हो गयीं।

यह भी एक किंवदंती है कि जिगर साहब एक बार इस ‘दारुल कुहला’ में घुसे तो हफ्ते भर तक बाहर नहीं निकले। कहते हैं कि उन्होंने अपने बदन के कपड़े तक हुक्के में जला डाले। हालांकि यह भोपाली आदत के मुताबिक थोड़ी अतिशयोक्ति लगती है।

कवि राजेश जोशी ने ‘दारुल कुहला’ के बारे में कुछ दिलचस्प बातें बताई हैं, मसलन इस ‘अंजुमन उल कुहला’ की फीस थी एक तकिया या एक ईंट। जाहिर है यहाँ सभी लोग लेटे ही रहते थे, इसलिए सिरहाने रखने के लिए कुछ होना जरूरी था। इस अंजुमन का संविधान भी सिर्फ एक वाक्य का था- ‘हर लेटा हुआ आदमी हर बैठे हुए आदमी को और हर बैठा हुआ आदमी हर खड़े हुए आदमी को आदेश दे सकता है और उसे मानना जरूरी होगा।’ 

इस संविधान के चलते हर व्यक्ति इस अंजुमन में लेटे-लेटे ही घुसता था क्योंकि गलती से भी अगर कोई बैठा या खड़ा दिख जाए तो लेटे हुए लोग उसे हुक्म देने लगते थे - ‘मियां, जरा मेरा हुक्का भर देना’ या ‘मियां, जरा मेरे लिए पान ले आओ।’

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