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सृजन के सम्मान का समारोह

सृजन के सम्मान का समारोह

कला के क्षेत्र में देश की परंपरागत शास्त्रीय संगीत, नृत्य, नाटक और अन्य लोक विधाओं को प्रोत्साहित करने के लिए आजादी के बाद स्थापित हुई संगीत नाटक अकादमी ने 1953-1954 के वर्ष से कलाकारों को सम्मान और फेलोशिप देने का सिलसिला शुरू किया जो अब तक जारी है। इस वर्ष जिन छ: लोगों को अकादमी रत्न के नाम पर फेलोशिप से सम्मानित किया गया उनमें लालगुडी जयरमन, श्रीराम लागु, यामिनी कृष्णमूर्ति, कमलेश दत्त त्रिपाठी, पंडित जसराज और किशोरी आमोणकर थीं।

लगता है कि सम्मानों के लगातार अवमूल्यन के इस दौर में शायद संगीत नाटक अकादमी अवार्ड की गरिमा कायम है और जिन्हें प्राप्त करना किसी भी कलाकार के जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि होती है। हिन्दुस्तानी संगीत में गायन के लिए 102 साल के वयोवृद्ध अब्दुल रशीद खाँ, वसुंधरा कोमकलि, तबला में लक्ष्मण सिंह सीन, शहनाई में अली अहमद हुसैन। कर्नाटक संगीत में गायक परासाला पुन्नामल, मंडोलियन वादन में यू. श्रीनिवास, मृदंगम में दंडमु़ति सुमिति मोहन राव और मणिपुरी  के नाट संकीर्तन में इबोल माचा सिंह को चुना गया।

नृत्य के क्षेत्र में भरतनाट्यम नृत्यांगना आनंद शंकर जयंत, कथक में प्रेरणा श्रीमाली, कथकली में कलामंडलम राजन, मणिपुरी में बीनू देवी, ओडिसी की गीता महालिक, कुचिपुडी में वैजंती काशी और सृजनात्मक प्रयोगशील नृत्य में दक्षा सेठ को सम्मानित किया गया।

28 सितंबर की शाम को कमानी सभागार में प्रथा के अनुसार अकादमी की अध्यक्ष की उपस्थिति में यह सम्मान देश की राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने प्रदान किया। सम्मान की रस्म अदायगी के बाद समारोह का आरंभ अकादमी द्वारा सम्मानित यू श्रीनिवास के मेंडोलिन वादन से हुआ। नैसर्गिक प्रतिभा के धनी यू श्रीनिवास ने दस साल की उम्र में ही अपने वादन से श्रोताओं को अचंभित कर दिया था।

कर्नाटक संगीत से जुड़े इस वादक ने विदेशी मूल के वाद्य पर कर्नाटक शैली को जिस गहराई से जोड़ा उससे मेंडोलिन एक नया रूप लेकर लोकप्रिय हुआ। इस समय यू श्रीनिवास इस वाद्य के पर्याय बन गए हैं। वे एक बहुत ही सुरीले और विलक्षण वादक हैं। रागदारी की बारीकियां उनके वादन में उभर कर आती हैं। शुरू से आखिर तक उनके वादन के रसास्वादन में श्रोता पूरी तरह मंत्रमुग्ध नजर आते हैं।

उन्होंने वादन की शुरुआत कर्नाटक के राग नरनारायणी से की। मधुर अन्दाज से छोटी-छोटी गमक, स्वर आन्दोलन आदि से उन्होंने राग की छटा बिखेरी। स्वर का एक-एक कण सफाई से स्पष्ट हो रहा था। कर्नाटक में स्वराभिव्यंजना और एक-एक स्वर के विस्तार की सीमा हिन्दुस्तानी संगीत से अलग है। लयकारी की विविधता में उनकी जो गणित है वह काफी सम्पन्न और विकसित है। उसका एक मनोहारी और कलात्मक रूप यू श्रीनिवास के वादन में भी था। राग किरवानी और आदिताल में निबद्ध संत त्यागराज की कृति को प्रस्तुत करने में उनका एक अनोखा और बहुत सरस अन्दाज दिखा। वॉयलिन के साथ जुगलबंदी में लय बांट में उनकी गहरी सूझ थी।

आखिर में गांधी भजन ‘रघुपति राघव राजा राम’ की भक्तिभाव में भरी प्रस्तुति भी बहुत कर्णप्रिय थी। मृंदगम पर अकादमी अवार्ड से पुरस्कृत दंडमुति सुमिति मोहन राव ने अपनी प्रभावी संगत का एक अलग रंग दिखाया। वादन में थाप, उंगलियों का थिरकन, चलन में लय के रूप और वादन की गूंज आदि में वे बेजोड़ थीं।
 

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