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भोजन कराने के लिए ढूंढते रह जाओगे कौआ

पितृपक्ष शुरु होते ही लोगों को कौआ की याद आने लगती है। अब यह न घरों की मुंडेर पर दिखता है और न ही आसमान में, ऐसे में लाख टके का सवाल यह कि तर्पण के समय इन्हें भोजन कर कैसे पुरखों को खुश किया जाएगा। बदलते आधुनिक परिवेश में इसकी संख्या तेजी से घट रही है। जिससे पर्यावरणविद् भी खासे चिंतित हैं।


अब गाहे-बगाहे ही फिल्मों में भी कौआ को लेकर फिल्मी गीत बनते हैं। फिल्म अभिनेता अनिल कपूर और जूही चावला अभिनीत ‘झूठ बोले कौवा काटे’ के बाद शायद ही यह फिल्मों में दिखता हो। यहां इसके जिक्र करने का उद्देश्य यह है कि पितृपक्ष में इसकी आवश्यकता आन पडम्ी है। जिस गति से कौआ की संख्या कम हो रही है। यह पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी खतरनाक है। हिन्दु धर्म के अनुसार पितृ पक्ष में इन्हें भोजन का एक हिस्सा देने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि कौआ अगर इसे खा ले तो पुरखों को आत्मा को शांति मिलती है। एक सप्ताह तक पितृपक्ष रहेगा। इस दौरान पूर्णिमा श्राद्ध 4 और 7 अक्तूबर को पडम् रहा है। ऐसे में लोगों की निगाहें अपने घरों के मुंडेरों और आसमान में होगी। ताकि अपने पुरखों की आत्मा को शांत कर सकें। लंबे समय से यहां रह रहे लोगों का कहना है कि काफी वक्त हो गए , पर शहर में कौआ को देखे हुए। ऐसे में पुरखों की तृप्ति के लिए कोई अन्य विकल्प ढूंढना पडम्ेगा।
पंडित जतिन गौडम्: इसकी महत्ता है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। कौआ के लिए विशेष तौर पर ‘गौर’ निकाला जाता है। कम होती संख्या चिंता का विषय है। इससे धार्मिक कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं। विधि- विधान से पितृपक्ष में श्राद्ध करने पर पुरखे खुश होकर परिवार पर कृपा करते हैं।
डेलचंद सागर, वन्य प्राणी जीव निरीक्षक: कौआ का विशेष महत्व है, न केवल धार्मिक बल्कि पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी। इसे आसमानी रखवाली कहा जाता है। हर तरह के जीव जंतु को चट कर पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचता है।

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