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दो टूक (02 अक्तूबर, 2010)

अभी चुनौती खत्म नहीं हुई। जिन मुट्ठी भर लोगों की नजर में हम-आप वोट बैंक हैं, वे अब जागने लगे हैं। इसलिए जरूरी है कि हम निश्चिंत होकर सो न जाएं।

यदि अभी इन ताकतों को मनमानी करने की छूट दे देंगे तो अब तक दिखाई सारी समझदारी जाया हो जाएगी। यह मुश्किल दौर जरूर है, पर इसमें एक खूबसूरत भविष्य का आश्वासन है। उसे महसूस करें और कदम बहकने न दें।

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  • Web Title:दो टूक (02 अक्तूबर, 2010)