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क्यों नहीं लगे बाप-दादा की जायदाद पर टैक्स

हम उन लोगों की तारीफ करते हैं, जो अपनी जायदाद खुद बनाते हैं और इतनी बनाते हैं कि उससे सात पुश्तें तक तर जाती हैं। हम यह भी मानते हैं कि जिन्हें वह जायदाद अपने पुरखों से मिलती है, उन्हें उसे भोगने का पूरा हक है। आखिर वह उनके बाप-दादा की जायदाद है। यह सामंती सोच है। उसे कई पूंजीवादी लोकतंत्रों ने या है। उन्होंने उस पर भी ठीकठाक उत्तराधिकार टैक्स लगा दिया है।
 
ये सब मैं मोहाली के आदेश सिंह के बेहतरीन लेख को पढ़ कर जान पाया। उन्होंने उत्तराधिकार पर टैक्स न लिए जाने के खतरे पर उंगली रखने की कोशिश की है। अपने समर्थन में उन्होंने कई मशहूर अर्थशास्त्रियों और नेताओं का हवाला दिया है। वह लिखते हैं, ‘हमारे देश में तो खुल कर उत्तराधिकार का खेल चलता है। अपनी जिंदगी में लोग जो भी कमाते हैं, उसे अपनी अगली पीढ़ी को दे जाते हैं। अगली पीढ़ी उसे आगे बढ़ा देती है। 

टैक्स का कहीं कोई मतलब नहीं। हिंदुस्तानी समाज के केंद्र में परिवार होता है। कभी-कभी बेलगाम उत्तराधिकार भी मीठे जहर का काम करता है। एक अच्छे-खासे आजाद शख्स को वंशवाद की गुलामी में धकेल देता है। और समाज में पैसा और अवसर दोनों का बुरा हाल हो जाता है। वह ऐसे मुकाम पर पहुंच जाता है, जहां समाज का तानाबाना ही तार-तार होने के कगार पर पहुंच जाता है।
 
‘एडम स्मिथ, जॉन मिलर, टॉमस जेफरसन, फ्रैंकलिन रूजवेल्ट वगैरह ने बेलगाम उत्तराधिकार का विरोध किया था। दुनिया के ज्यादातर विकसित देश उत्तराधिकार पर 40 प्रतिशत टैक्स लेते हैं। उसका वे लोग सामाजिक सुरक्षा के लिए इस्तेमाल करते हैं। एडम स्मिथ पूंजीवाद के पितामह हैं। उन्होंने आगाह किया था कि वक्त के साथ-साथ पूंजीवादी समाज में पैसे और अवसरों के बीच खाई और चौड़ी होगी। उससे समाज का नाजुक तानाबाना तार-तार होगा। मौत के बाद अपनी जायदाद को देने के अधिकार का मसला खासा टेढ़ा है।
 
‘उत्तराधिकार तो वहीं तक ठीक है, जब बच्चे उन पर पूरी तरह निर्भर हों। जॉन मिलर ने उत्तराधिकार कानून में बदलाव की मुहिम चलाई थी। उनका मानना था कि अपनी जायदाद के एक खास हिस्से में ही वसीयत लागू होनी चाहिए। वह उसे संपत्ति अधिकार के मामले में पूरी तरह जायज ठहराते हैं।
 
‘टॉमस जेफरसन ने ‘वेल्थ ऑफ नेशन्स’ को राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर बेहतरीन किताब माना है। उन्होंने एक बार कहा था कि क्यों न तमाम उत्तराधिकारी विशेषाधिकारों को खत्म कर दें, क्योंकि यह धरती तो जिंदा लोगों के लिए है। वह स्मिथ का हवाला देते हुए कह सकते थे कि आदमी की हर पीढ़ी का धरती पर बराबर का अधिकार नहीं है।’ 

फ्रैंकलिन रूजवेल्ट ने भी इसी तरह की मुहिम चलाई थी। ‘एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जबर्दस्त जायदाद का मिलना अमेरिकी लागों की भावनाओं और आदर्शो से मेल नहीं खाता है। वह चाहे उत्तराधिकार में मिले या किसी तोहफे में।’ उनका कहना था कि ‘उत्तराधिकारी आर्थिक ताकत इस पीढ़ी के आदर्शों से मेल नहीं खाती। उसी तरह जैसे उत्तराधिकारी राजनीति इस पीढ़ी के आदर्शों में नहीं आती। ये पीढ़ी कहां चाहती है कि सरकार बनाने में वंश परंपरा हावी हो।’

बेलगाम उत्तराधिकार की बुराइयों का असर पाकिस्तान पर देखा जा सकता है। एक सामंती समाज में बेरोकटोक उत्तराधिकार की बुराइयां देखनी हों तो पाकिस्तान जाओ। उस मामले में पाकिस्तान सचमुच बदकिस्मत है। पैसे और अवसरों के बीच की गहरी खाई ने वहां के समाज के तानेबाने को तहस-नहस कर दिया है।

जरा स्वात घाटी की मिसाल लें। वहां उस खाई को पाटने की कोशिश नहीं हुई। और अब स्वात घाटी का हाल सब जानते हैं। पहले पूरी स्वात घाटी को महज चार जमींदार कंट्रोल करते थे। अब जमींदार और चुने हुए नेता एक ही थे। उन्हें एक नाकारा और कम पैसा पानेवाली पुलिस सुरक्षा देती थी। अमेरिका की मदद से पाकिस्तानी सेना किसी तरह घाटी को काबू में रख पाई।’ 

फिलहाल, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी और ग्रीस उत्तराधिकारी जायदाद पर 40 प्रतिशत टैक्स लगाती है। कुछ और यूरोपीय देशों में थोड़ा कम टैक्स है। हमारे प्रधानमंत्री तो बड़े अर्थशास्त्री हैं। वह और वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी जरूर जानते होंगे कि आदेश सिंह क्या कह रहे हैं? यह सही वक्त नहीं है कि यूपीए सरकार उत्तराधिकार टैक्स लागू करने की पहल करे।

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