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मूड ही तो है

अपनी कुर्सी पर पसरे पड़े थे वह। टीम ने महसूस किया था कि आज सुबह से ही उनका मूड चौपट है। साथियों ने उनका मूड लाइन पर लाने की कोशिश की थी, लेकिन..

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के साइकोलॉजिस्ट मोशे बार मानते हैं कि जब हमारा मूड बिगड़ रहा हो, तो हमें कई चीजों पर एक साथ सोचना शुरू कर देना चाहिए। अलग-अलग चीजों पर सोचते हुए धीरे-धीरे हमारा मूड ठीक होने लगता है। उसकी क्या वजह है? डॉ. मोशे का कहना है कि डिप्रेशन में हम एक ही चिंता में डूबे रहते हैं, लेकिन जैसे ही हम एक से दूसरी चीज की ओर बढ़ते हैं तो डिप्रेशन गायब होने लगता है।

आमतौर पर हम परेशान किसी एक चीज को लेकर ही होते हैं। परेशानी ही इसलिए होती है क्योंकि हम उसके आगे सोच ही नहीं पाते हैं। धीरे-धीरे वह हमारी तमाम सोच पर हावी हो जाती है। और हमें थकाने लगती है। हमारा तन और मन उसके जाल में फंस जाता है, लेकिन जैसे ही हम उस चीज से अपना मन हटाने लगते हैं, उसका खराब असर हमसे दूर होने लगता है। लगातार सोचने का असर यह होता है कि हम कहीं रुकते नहीं हैं।

सारी दिक्कत तो रुकने से ही होती है। अपनी सोच के लगातार चलने रहने से नई-नई चीजों पर हमारा ध्यान जाता है और वह प्रक्रिया हमें डिप्रेशन से बाहर निकाल ले जाती है। आखिर डिप्रेशन से हमें बाहर आना ही है, क्योंकि चलते चले जा रहे हैं। डिप्रेशन को तो रुके रहने की खुराक चाहिए और वह खुराक जब नहीं मिलती है, तो डिप्रेशन उड़ जाता है। वह जब उड़ेगा, तो हमारा मूड बेहतर हो ही जाएगा। और उस मूड का बेहतर होना
बेहद जरूरी है। उसके बिना हम कोई काम कायदे से नहीं कर पाते। क्रिएटिव होने के लिए तो अपने मूड का लाइन पर आना वैसे भी जरूरी है।

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