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दिलशाद को नहीं अयोध्या फैसले की कोई फिकर

पिछले 22 वर्षो से रावण और मेघनाथ का पुतला बना रहे दिलशाद को अयोध्या पर आए फैसले की बिल्कुल परवाह नहीं है, उसे फिकर है तो अपने काम को पूरी भक्ति और श्रद्धा से अंजाम देने की। दिलशाद के मुताबिक अपने काम को ईमानदारी से करना सबसे बड़ी पूजा है, और राम से ही उसके परिवार की दाल-रोटी चल रही है। पुतले बनाते-बनाते रामलीला दिलशाद के तन-मन में रच-बस गई है। रामलीला का हर प्रसंग उन्हें मुंह-जबानी याद है।

दिलशाद ने बताया कि रामलीला में काम करने का उद्देश्य मुनाफा नहीं बल्कि श्रद्धा है, अयोध्या जैसे मसलों से उनका कोई सरोकार नहीं है। रामलीलाओं में पुलते बनाना गुलावठी निवासी दिलशाद का पुश्तैनी काम है, और अब दिलशाद की आगे की पीढ़ी इस काम को संभालने के लिए तैयार है। दिलशाद ने बताया कि वे पिछले 22 वर्षो रामलीला में लगातार पुतले बनाने का काम कर रहे हैं। इसकी प्रेरणा उन्हें अपने पिता से मिली। दिलशाद ने बताया कि वैसे तो काम अधिक होने की वजह समय नहीं बचता है, मगर फुर्सत रामलीला देखने उन्हें बेहद मजा आता है।

दिलशाद को रामलीला का एक-एक प्रसंग याद है। रावण और मेघनाथ का पुतला बनाने का जिम्मा दिलशाद के पास होता है। और वे ही पुतले को फाइनल टच देते हैं। दिलशाद ने बताया कि पुलता बनाने की तैयारी एक माह पहले से शुरू हो जाती है। इसमें उनकी आठ लोगों की टीम लगी हुई है। दिलशाद को रामलीला में होने वाली आतिशबाजी में दो साल से पहला पुरस्कार मिल रहा है। दिलशाद ने बताया कि पुलते को तैयार करने में असर के कागजी बांस का इस्तेमाल किया जाता है। जिसकी लकड़ी काफी लचीली होती है। और उसे किसी से आकृति में आसानी से ढाला जा सकता है। दिलशाद ने कहा कि रामलीला में काम वे पैसे के लिए नहीं बल्कि रामलीला व भगवान में आस्था के चलते करते हैं।

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