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सियाराममय सब जग जानी

मेरे भाई बहन आप अपने आप से पूछिये कि आपके मन में जो अच्छे विचार, अच्छे भाव प्रगट होते हैं, सत्संग के अभाव में क्या वो निरंतर बने रहते हैं । नहीं, निरंतरता नहीं रहती। इसीलिए कहते हैं कि रुचि हो और निरंतर हो, सर्वोत्तम और निर्बाध हो। जीवन में अच्छे विचारों के लिए मन में रुचि निरंतर बनाए रखने के लिए सत्संग और राम कथा की आवश्यकता है। सूत्र के रूप में दो बात याद रखना-अटको मत और भटको मत। तुम जिस स्थिति में रहो, तुम्हारी आत्मा यदि प्रसन्न हो जाए तो फिर अटको मत और जहां-तहां भटको भी मत।

रुचि निरंतर रहेगी भगवत् कथा से। वैसे निरंतर तो कई बातें होती हैं जीवन में। हमारा धंधा निरंतर चलता है,जिसका जो व्यवसाय है निरंतर चलता है, लेकिन वह सर्वोत्तम नहीं है। निरंतर के साथ सर्वोत्तम होना जरूरी है।

मैं मुम्बई में एक भक्त के यहां गया। वहां एक भाई बहुत अच्छा भजन गा रहे थे। शब्द तो मुझे याद नहीं, लेकिन भाव याद है। कह रहे थे, सद्गुरु की नौकरी सबसे बढ़िया और खरी है।

फिर उन्होंने मुझसे कहा कि बापू, आप कुछ कहें, तो मैंने कहा, भाई सद्गुरु की नौकरी के बारे में आप बोल रहे हैं तो मैंने नौकरी की है, इसलिए उसके कुछ नियम जानता हूं। नौकरी पाने के लिए पहले अर्जी देनी पड़ती है फिर इंटरव्यू के लिए बुलाते हैं और जब सेलेक्ट कर लेते हैं तो फिर कई वर्षों तक स्थाई नहीं करते, बीच-बीच में ब्रेक दे देते हैं।

तीन साल के बाद फिर स्थाई करते हैं, फिर इंक्रीमेंट नियमानुसार, फिर प्रमोशन, ऐसा होता है। मैंने कहा कि, सद्गुरु की नौकरी में जो इंक्रीमेंट होता है। वह है रुचि । सद्गुरु साधक की रुचि बढ़ा देता है। लेकिन कब? जब वह निरंतर हो, स्थाई हो। रुचि निरंतर तैल-धारावत् हो।

मेरे कहने का मतलब भगवत्कथा से जीव के मन अच्छे विचार प्रकट होते है और वह धीरे-धीरे निरंतर बढ़ते हैं। अन्य किसी चर्चा में रुचि नहीं बढ़ेगी, बढ़ेगी तो निरंतर नहीं होगी, निरंतर होगी तो वह सर्वोत्तम नहीं होगी और यदि सर्वोत्तम होगी तो निर्बाध नहीं होगी। यह जो अंतिम बात है, भागवत कथा ही यहां तक आपको पहुंचा सकती है।
  
कथा को जिस मूल रूप में आचार्यो ने महापुरुषों ने रखा है उसी रूप में उसको उठाना चाहिए। उनके प्रसंगों की संक्षेप में तात्विक मूल रूप से चर्चा करें एवं चर्चा करते हुए हम उस रसधारा की ओर अग्रसर हों, जिसको पाने के बाद मन में फिर कोई निराशा पैदा न हो। नित नूतन आनंद, नित नया सुख आपको अनुभव हो, इसीलिए कथा है। जड़-चेतन सभी में परमात्मा का दर्शन करना है लेकिन यह गुण तभी विकसित होगा जब उसके  मूल में गुरु निष्ठा होगी और यह गुण तो धीरे-धीरे ही विकसित होता है। 
  
संसार में सब अच्छे नहीं हैं। जड़ चेतन गुणदोष मय यह विश्व है, लेकिन अपने जीवन को हम ऐसा बनाएं कि जहां तक संभव हो हम उनके भीतर अच्छाई को देखते-देखते आगे बढ़ें। लोग कहते हैं कि वह ऐसा बोलता है, तो हम क्यों पीछे रहें? हम भी बोलेंगे। इससे होगा क्या? जीवन में कचरा बढ़ता ही जाएगा। उसी समय यदि हम अपने आपको सबमें सीताराम की दृष्टि रखकर देखें, तो यह विकास है । सियाराममय सब जग जानी। 

परिवार से शुरू करो, परिवार में पंचदेव है ऐसा मानो। परिवार में जितने सदस्य हों और उनमें से जिस व्यक्ति में ज्यादा विवेक हो उसको गणेशजी समझो। जिसमें विवेक की प्रधानता हो, उसकी प्रथम पूजा, भले ही वह तुमसे छोटा हो। घर में ठाकुरजी का मंदिर तो होना ही चाहिए, लेकिन वह जो सजीव देवता घर में हैं उसकी पहले पूजा करो।

परिवार में एक व्यक्ति बहुत श्रद्धावान है। श्रद्धा जो शास्त्र-सम्मत हो, ऐसी श्रद्धा जिस माँ, बहन या बेटी में हो, उसको दुर्गा समझकर आदर दो कि यह भवानी है-भवानी-शंकरौ वन्दे श्रद्धा-विश्वास रूपिणौ। इसी तरह परिवार में पंचदेव की पूजा करो।

यह बात सदैव ध्यान रखो कि तीर्थों की यात्रा सरल है, लेकिन परिवार की यात्रा बहुत कठिन है। परिवार में देवताओं का दर्शन करना बहुत कठिन है और वह जब तक दिखाई नहीं देगा तब तक सद्गुरू की कृपा नहीं होगी ।
  
परिवार में बुजुर्ग,छोटा या बड़ा जो भी है, उसके विचार में यदि कल्याण की भावना हो और वह सदा यही सोचे कि चलो भाई अपना थोड़ा घाटा हो, लेकिन दूसरों का कल्याण हो तो उसको शिव समझो। उसका आदर से अभिषेक करो। अभिषेक का मतलब यह नहीं कि उन पर दूध चढ़ाओ, ऐसी बात नहीं, उनका आदर करो यही कल्याण की बात है।
  
मैं परिवार में सबको कहता रहता हूं कि जीवन में शांति को पाने के लिए जो भी त्यागना पड़े, त्याग दो। मेरा अकाटय़ सूत्र है। किसी को धन देने से शांति बच जाती है तो उस शांति के लिए धन दे दो। हम क्या चाहते हैं? शांति हो या न हो, पर रुपया का ख्याल ज्यादा करते हैं। इसका मतलब यह भी नहीं कि मैं रुपयों का विरोधी हूं, लेकिन आप अशांत होकर क्या पाओगे?
  
एक हजार रुपये का घाटा सहना पड़ रहा है, लेकिन हमारे में  शांति बनी रहे, हमारे मन में जप बना रहे , हमारा सत्संग टिक गया तो हजार का कोई मूल्य नहीं है। शांति विश्राम, परम विश्राम सबको मिल सकता है। लेकिन इसके लिए थोड़ा त्याग तो करना पड़ेगा। शांति को हम क्यों लुटाएं, क्यों बर्बाद करें। मैं तो हमेशा ही कहता रहा हूं- अपने जीवन में शांति बनाए रखो।

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