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स्तन कैंसर जांच से कतराती हैं भारतीय मूल की महिलाएं

स्तन कैंसर जांच से कतराती हैं भारतीय मूल की महिलाएं

विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय उप महाद्वीप की महिलाएं अपनी जान को जोखिम में डाल रही हैं क्योंकि वह स्तन कैंसर जांच के लिए आगे आने के मामले में संकोच करती हैं।
    
मैनचेस्टर में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कहा कि इस वर्ग की महिलाएं राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के तहत परीक्षण करने के लिए सामने आने में कतराती हैं। इसके पीछे सांस्कतिक कारण और एशियाई समुदाय में स्तन कैंसर के बारे में जागरूकता का अभाव हो सकता है।
    
मैनचेस्टर से आई खबरों के अनुसार ताजा सबूतों से पता चलता है कि भारतीय उप महाद्वीप की केवल एक तिहाई महिलाएं ही स्तन कैंसर जांच करवाती हैं।

ओल्डहम में कराए गए एक अध्ययन के अनुसार ब्रिटिश एशियाई महिलाओं की संख्या उन महिलाओं की तुलना में आधी होती है जो एनएचएस के तहज नियमित जांच करवाने जाती हैं जिससे स्तन कैंसर के आरंभिक संकेत पता चल सकें।
   
ब्रिटेन में चिकित्सक काफी समय से इस बात पर संदेह कर रहे हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय में यह जांच करवाने वालों की दर काफी कम है। लेकिन अपने तरह के इस पहले अध्ययन में यह खुलासा हो गया है कि केवल 35 प्रतिशत एशियाई महिलाएं ही जांच करवाती हैं जबकि अन्य गैर एशियाई महिलाओं में इनकी आबादी 70 प्रतिशत थी।

स्तन कैंसर विशेषज्ञ लिस्टर बार ने कहा कि कई कारणों से एशियाई महिलाएं जांच कराने से कतराती हैं। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा महज भाषाई मुद्दा नहीं है। एशियाई समुदाय में स्तन कैंसर को लेकर जागरूकता का अभाव है। बार ने कहा कि सांस्कतिक समस्याएं भी हैं जिसके कारण वे आगे आने तथा अपने परिवार और मित्रों के साथ विचार-विमर्श करने में संकोच करती हैं।

एक रेस्त्रां समूह की मुख्य कार्यकारी निगहत अवान ने कहा कि एशियाई लोग काफी अंतर्मुखी होते हैं। उन्हें लगता है कि इसके बारे में कुछ बातचीत नहीं की जाए और यह ठीक हो जायेगा। हमें लोगों को इससे निपटने का तरीका बताना ही होगा। निगहत की मां की 51 वर्ष की आयु में स्तन कैंसर के कारण मृत्यु हो गई थी।

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