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राजनीति की उम्र

युवावस्था की संभावनाएं असंख्य हैं, लेकिन प्रौढ़ या वृद्ध होना भी उतना बुरा नहीं है। वयस्कता और प्रौढ़ता की भी समाज को जरूरत होती है। अब यह बात और है कि कोई कम उम्र में भी परिपक्व और वयस्क ढंग से सोचे और कोई लंबी उम्र के बाद भी अपनी नौजवानी के अपरिपक्व विचारों से छूट न पाए। लेकिन मामला जब राजनीति का हो तो इतनी दूर तक सोचने की फर्सत नहीं होती और फिलहाल लोकसभा चुनाव इतने पास हैं कि क्या नौजवान और या अनुभवी, किसी भी किस्म के राजनेता कोई खतरा उठाने को तैयार नहीं हैं। अब तक प्रधानमंत्री पद के एकमात्र घोषित उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी ने युवाओं के साथ नेट पर चैटिंग में यह घोषित करना जरूरी समझा कि वे प्रधानमंत्री पद के लिहाज से पूरी तरह स्वस्थ और फिट हैं, हालांकि उनकी फिटनेस को लेकर विवाद कभी नहीं था, जो कुछ विवाद है, वह उनकी विचारधारा को लेकर है। वैसे भी भारतीय लोकतंत्र में इस बात को बहुत तवज्जो नहीं दी जाती कि उनके नेता के ‘सिक्स पैक्स’ हैं या नहीं, बल्कि ‘बाहुबली’ फिल्मी अभिनेता भले ही लोकप्रिय हों, यह शब्द राजनीति के संदर्भ में तो अच्छे अर्थो में नहीं इस्तेमाल होता। संजय दत्त को समाजवादी पार्टी अपना उम्मीदवार भले ही बना ले, वे इस वजह से राजनीति में आगे नहीं जा पाएंगे कि उन्होंने शानदार बॉडी बना रखी है। फिर आडवाणी जी में इस बात को लेकर असुरक्षा क्यों है? एक वजह तो शायद यह है कि उनके अतिरिक्त जो तथाकथित प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं, उनमें से कुछ, राहुल गांधी, नरन्द्र मोदी वगैरा उनसे उम्र में काफी कम हैं। दूसरी बात यह है कि इस चुनाव में युवा वोटरों की तादाद बहुत बड़ी होगी और आडवाणी जी को लगता हो कि आजकल के युवा फिटनेस के प्रति ज्यादा आकर्षित हैं, इसीलिए तो सार नामी फिल्मी हीरो आजकल अभिनय से ज्यादा शारीरिक सौष्ठव का ख्याल रखते हैं। फिर चुनाव का मामला है, मार्केटिंग के लिए जिन भी चीजों का प्रचार किया जाए, कम ही है। लेकिन युवा होने का अर्थ है नए, उदार, ताजा विचारों की हवा के लिए खिड़कियां खोलना, जो ऐसा कर पाए, वह युवा है भले ही उसकी उम्र कुछ भी हो।ं

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