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गिरिडीह में बुलेट और बैलेट की जंग

गिरिडीह संसदीय क्षेत्र में बुलेट और बैलेट के बीच जंग की धमक स्पष्ट सुनायी पड़ने लगी है। यहां 23 अप्रैल को लोकतंत्र का महापर्व मनाया जाना है। नक्सलियों के वोट बहिष्कार के ऐलान ने वोटरों के चेहरे पर खौफ की लकीरं खींच दी है। पुलिस नक्सलियों के मंसूबों के विफल करने का लगातार दावा कर रही है, लेकिन वोटर अब भी सहमें हैं।ड्ढr गिरिडीह लोकसभा के छह विधानसभा क्षेत्रों में से पांच में अप्रत्यक्ष रूप से नक्सलियों का राज चलता है। इनमें डुमरी, गिरिडीह, गोमिया, बेरमो और टुंडी हैं। सिर्फ बाघमारा में नक्सलियों का प्रभाव कुछ कम है। बेरमो के नवाडीह थानांतर्गत ऊपर घाट इलाके की तो बात ही कुछ और है। यहां नक्सली इतने प्रभावी हैं कि कोई प्रत्याशी चुनाव प्रचार करते तक वहां नहीं जा रहा है। नक्सलियों से निपटने के लिए यहां बीएसएफ के जवानों को लगाया गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि ऊपर घाट के आसपास कई लैंड माईंस लगाये गये हैं। पुलिस ने इनका पता लगाने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है, ताकि चुनाव के दिन किसी बड़े वारदात को अंजाम नहीं दिया जा सके। बैलेट पर विश्वास करने वालों का कहना है कि गिरिडीह में त्रिकोणीय मुकाबला होगा। भाजपा के रवींद्र पांडेय, झाविमो के डॉ सबा अहमद और झामुमो के टेकलाल महतो (सांसद) के बीच कांटे की टक्कर है। यहां के 13 लाख 34 हाार वोटरों में मुसलिम मतदाता लगभग दो लाख 65 हाार हैं। इनका झुकाव झाविमो प्रत्याशी डॉ सबा अहमद की ओर है। वैसे राजद के हुमायूं अंसारी भी अल्पसंख्यक वोट पर सेंधमारी करने में जुटे हैं। तीन बार सांसद रह चुके रवींद्र पांडेय वोटरों को रिझाने का हर हथकंडा जानते हैं। गोमिया और बेरमो विधानसभा में भाजपा का ही कब्जा है। इसका लाभ रवींद्र को मिलेगा। पूर्व मंत्री सबा अहमद भी राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं। अल्पसंख्यक वोटों के अलावा वह हर तबके का समर्थन हासिल करने की जुगत लगा रहे हैं।ड्ढr झामुमो सांसद टेकलाल महतो की क्षेत्र में जबरदस्त पकड़ है, लेकिन पांच साल तक मतदाताओं से कटे रहने के कारण उनके प्रति लोगों की नाराजगी भी देखने को मिल रही है। राजद के हुमायूं अंसारी सहित अन्य प्रत्याशी भी चुनाव परिणाम को अपने पक्ष में करने का हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। यदि मतदाता निर्भिक होकर मतदान कर सकें, तो यह पुलिस-प्रशासन की बड़ी सफलता मानी जायेगी।

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  • Web Title: गिरिडीह में बुलेट और बैलेट की जंग