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अदालत नहीं गये राज्य के 30 हचाार वकील

सीआरपीसी के सेक्शन 30एवं 50 में संशोधन के विरोध में 23 जनवरी को राज्य के करीब 30 हाार वकीलों ने कोर्ट में काम नहीं किया। झारखंड राज्य बार कौंसिल के आह्वान पर वकीलों ने अदालती कार्य से अपने को अलग रखा। हाइकोर्ट में कोई भी वकील बहस करने नहीं गया। बार कौंसिल के चेयरमैन पीसी त्रिपाठी के अनुसार राज्य के हर कोर्ट में वकीलों ने अपने को कार्य से अलग रखा। उपभोक्ता फोरम, ट्रिब्यूनलों में भी यही स्थिति रही।ड्ढr वकील हाइकोर्ट तो पहुंचे थे, लेकिन बैठक खाने में ही उन्होंने पूरा दिन गुजार दिया। सीआरपीसी के सेक्शन में संशोधन कर यह प्रावधान किया गया है कि वकील अब बिना किसी अपरिहार्य कारणों के तिथि नहीं ले सकते हैं। डेट लेने के लिए उन्हें वाजिब कारण बताना होगा। कोर्ट यदि संतुष्ट होगा, तभी डेट दिया जायेगा। इसी प्रकार सात साल तक की सजा वाले मामले में थाना को ही बेल देने का अधिकार दिया गया है। इसका वकील विरोध कर रहे हैं। बार कौंसिल ने सभी वकीलों को इसमें सहयोग करने के लिए आभार जताया है। बहिष्कार के निर्णय से सहमत नहीं हैं कई रांची। सीआरपीसी में संशोधन के विरोध में बार कौंसिल के निर्णय को कई वकील सही नहीं बता रहे हैं। कुछ का कहना है कि चूंकि वह बार कौंसिल के सदस्य हैं। इस कारण उसका निर्णय मानने के लिए बाध्य हैं। लेकिन कार्य बहिष्कार ही विरोध का तरीका नहीं है। हाइकोर्ट के वकील डॉ एसएन पाठक ने कहा कि वह कौंसिल के निर्णय का सम्मान करते हैं, लेकिन एक कानूनविद् होने के नाते वह बहिष्कार और हड़ताल को उचित नहीं मानते। सफेद बिल्ला लगाकर भी विरोध कर सकते थे। संशोधन की त्रुटियों को कोर्ट में चुनौती देकर हम कानूनी लड़ाई भी लड़ सकते हैं। लेकिन कार्य बहिष्कार से लाखों लोगों को परशानी हुई है। इस जिम्मेवारी से हम नहीं बच सकते। आरबी शर्मा का भी कहना है कि विरोध के दूसर तरीके अपनाने चाहिए। कार्य बहिष्कार के कारण कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई नहीं हो सकी। समर्थन भी कर रहे हैं वकीलरांची। सीआरपीसी के सेक्शन 30एवं 50 में संशोधन का झारखंड राज्य बार कौंसिल भले ही विरोध कर, लेकिन कई वकील इसे उचित भी बता रहे हैं। इन वकीलों का कहना है कि इससे अदालतों में मामलों का बोझ तो कम होगा। जेल में कैदियों की संख्या कम होगी। सरकार का खर्च बचेगा। वहीं दूसरी ओर लोगों का कहना है कि थाना को बेल देने का अधिकार देना गलत है।ड्ढr सीनियर एडवोकेट ए अल्लाम का कहना है कि सीआरपीसी के 30में किया गया संशोधन सही है। संशोधन से अब निचली अदालतों में वकील सिर्फ डेट पर डेट नहीं ले सकेंगे। अब डेट लेने के लिए वकीलों को अपरिहार्य कारण बताना होगा। बिना उचित और जरूरी कारण बताये उन्हें डेट नहीं मिलेगा। हालांकि वह थाना को बेल देने के अधिकार से सहमत नहीं है। उनका कहना है कि बेल देने का अधिकार सिर्फ अदालत को ही मिलना चाहिए। वकील एचके लाल का कहना है कि संशोधन उचित है। थाना को बेल देने के अधिकार से लोगों को अनावश्यक जेल में नहीं रहना पड़ेगा। जेल में कैदियों की संख्या कम होंगी। इस कारण यह संशोधन विरोध करने लायक नहीं है। यंग लॉयर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष नवीन कुमार सिंह ने संशोधन का विरोध किया है। उनका कहना है कि थाना को बेल का अधिकार दिये जाने से पुलिस और अपराधियों के बीच रिश्ता गहरायेगा। समाज में अशांति फैलेगी और अपराध का ग्राफ बढ़ेगा।

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