DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

तब सीना चाक हुआ,अब सबूत कहाँ से लाएँ !

ाब घर में आग लगाई गई! माता-पिता को लहूलुन किया। तब वह तीन साल की बच्ची थी! कई दिन बादोब माता-पिता की हालत संभली। तब वह आलमबाग थाने गए, पुलिस ने रिपोर्ट लिखी नहीं, दंगाइयों का खौफ ऊपर से भर दिया। बस! माता-पिता ने खटिया पकड़ ली और अन्तत: मौत के मुँह में समा गए। अब ‘मैं कहाँ से लाऊँ एफआईआर की कॉपी, कैसे दूँ- पीड़ित होने के दस्तावेी साक्ष्य। हाँ, कुछ फोटो हैं..शपथ पत्र भी है।’ इसे साक्ष्य क्यों नहीं मानाोाता? एफआईआर नहीं है, तब क्या हम पीड़ित नहीं है। यह सब कहते हुएोसदीप कौर की आँंखें छलछला उठीं। यह देख-सुन ‘84 के दंगा पीड़ितों’ की सुनवाई कर रहे अधिकारी भी हिल गए।ोसदीप इकलौती नहीं थी, बल्कि उसकी तरह के 200 लोग थे।ोो दंगा पीड़ित तो हैं मगर उनके पास सबूत का अभाव है।ड्ढr शुक्रवार को कलेक्ट्रेट के स्वर्णोयंती सभागार के बाहर ‘1े दंगा पीड़ितों ’ काोमावड़ा था। कई की कमर कमान हो गई थी। कुछ को खाँसी का दौरा पड़ रहा था। कईोोड़ी आँखों में 25 साल पुराना ‘खौफ’ झाँकता दिख रहा था। कोरं नम थीं। इन पीड़ितों केोख्मोुदा-ाुदा थे। यादा परशान वे लोग थे,ोिन्होंने खौफ के उस मांर को कानूनी परचम से नहीं ढंका था। यानी एफआईआर नहीं करवाई। घायल दशा में तस्वीरं नहीं खिंचवाईं। आग की लपटों को कैमर में कैद नहीं करवाया।..25 साल बाद भी कानून ने उन्हें दंगा पीड़ित नहीं माना। अब भी दंगा पीड़ित कैसे माने? ये सवाल अधिकारियों की ओर ये हो रहे थेोिससे दंगे का दंश झेल रहे लोगों केोख्म ताो होकर टीसने लगे। वह आसमान की ओर देखते..फिर मायूस कदम से सुनवाई कक्ष से बाहर की ओर चल पड़ते। तबोाँच दल के सदस्य दिलासा दिलाते-ााँच कराईोाएगी, न्याय भी दिलाने की कोशिश होगी। परशान मत हों। कई मौकों परोाँच दल के सदस्यों को ही पीड़ित के सामने बेबसी भर हाथोोड़ने पड़े। मारवाड़ी गली की सिन्दर कौर का घरोला था, दुकान लूटी गई। कई चश्मदीद हैं, मगर कानूनी साक्ष्य के अभाव में उन्हें शासन की मदद नहीं मिली। रामगढ़ कालोनी कानपुर रोड निवासी हरािन्दर कौर और इसी इलाके की रहने वाली योतिंदर कौर, अमौसी एयरपोर्ट के करीब की निवासी मनाीत कौर, लोनहा निवासी दारा सिंह, पिपरसंड निवासी दलबीर सिंह, मेमौरा निवासी निर्मल सिंह..एलडीए कालोनी निवासी बलदेव सिंह..ौसे दो सौ से अधिक ऐसे पीड़ित आए थे। इनके पास कोई ऐसे साक्ष्य नहीं थे,ोिन्हें कानून की नार में साक्ष्य मानाोा सके।ड्ढr कानूनी साक्ष्य न रखने वाले पीड़ितों की इतनी बड़ी संख्या देखोाँच दल के सदस्य अपर आयुक्त कानपुर श्याम कृष्ण, विशेष सचिव गृह ज्ञान सिंह, अपरोिलाधिकारी (पश्चिम) ोपी सिंह, विशेष कार्याधिकारी (गृह) एके सिंह, अपर नगर मािस्ट्रेट एसके दुबे ने पीड़ितों को न्याय दिलाने का भरोसा दिलाया है। सभी पीड़ितों से कहा गया है कि उनके साथ हुए हादसे कीोाँच कराईोाएगी।ोाँच दल के सदस्य भी साक्ष्योुटाने में मदद करंगे। वह भी कुछ साक्ष्य एकत्रित करं। कुछ अधिकारियों ने ’ऑफ द रिकार्ड’ स्वीकारा कि दंगों के समय लोगोान-माल की हिफाात में मशगूल रहते हैं। सामान्य दिनों की तरह पड़ोसियों की सलाह या मदद भी नहीं मिल पाती है। ऐसे में कई बार पीड़ितों के पास कोई कानूनी साक्ष्य नहीं रहता है। 25 साल पहले की स्थिति और भी खराब थी।ड्ढr

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: तब सीना चाक हुआ,अब सबूत कहाँ से लाएँ !