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सरकारी संस्थाओं से उठता भरोसा

अपने छात्र जीवन में हम भी स्कूल जाते थे। कुछ फीस भी चुकाते थे। अब शिक्षा पूरी तरह फ्री है। बच्चों को मिड-डे-मील भी मिलता है। तब भी सरकारी स्कूलों को बच्चों नहीं मिल रहे हैं। स्कूल वाले फर्जी तरीके से उपस्थिति बढ़ा रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज की सुविधा पहले भी थी, अब भी है, लेकिन तब सरकारी अस्पतालों में प्रसव के लिए आई महिलाओं और नसबंदी कराने वाली औरतों को रुपये नहीं मिलते थे। अब मिलते हैं, लेकिन सभी जानते हैं कि एकाधिक रेफरल अस्पतालों को छोड़ दें, तो कोई भी सक्षम आदमी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों की ओर रुख नहीं करता। क्यों? मुफ्त सुविधाओं का ऐसा हाल क्यों है? दरअसल, सरकारी संस्थाओं की साख को बट्टा लग गया है।
दिलीप गुप्ता, पौढ़ी गढ़वाल

अंधेर नगरी
खबर पढ़ी थी कि महंगाई से निपटने के लिए रिजर्व बैंक ‘लोन’ पर फिर से ब्याज दरें बढ़ाने की सोच रहा है। खबर सही साबित हुई। जनता महंगाई से वैसे ही हाहाकार कर रही है, उसे बैंक-लोन की किस्तें जुटाना भारी पड़ रहा है। उस पर निरंतर बढ़ती ब्याज दरों की चोट। पता नहीं इस देश के कैसे नीति-नियंता हैं। इन्होंने कहां से अर्थशास्त्र पढ़ा है, जो इनको हर मर्ज का इलाज जनता की चमड़ी उधेड़ने में ही दिखता है। मसलन, पिछले कुछ अंतराल में कई बार रिजर्व बैंक ने रेपो रेट बढ़ाकर लोन की ब्याज दरें बढ़ाईं, किंतु नतीजा क्या निकला? महंगाई सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही गई। कहीं यह ब्याज दरें बढ़ाकर कुछ प्राइवेट बैंकों को विशेष लाभ पहुंचाने की चाल तो नहीं है? हमें इस पहलू पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, वरना अंधेर नगरी, मूरख मंत्री और बेखबर राजा वाला सिलसिला ऐसे ही चलता रहेगा और भोली-भाली जनता मरती रहेगी।
सुरेंद्र त्रिपाठी सुमन, हल्द्वानी

भय बिनु होई न प्रीति
कश्मीर एक बार फिर सुलग उठा है। वहां की सारी शर्मनाक करतूतों के पीछे अलगाववादियों का हाथ मानकर या उनके मत्थे दोष मढ़कर हम वास्तविकता से भाग नहीं सकते। आखिर कब तक हमारे देशभक्त सैनिक, अर्धसैन्य बलों व पुलिस के जवान इनके क्रूर हाथों का निवाला बनते रहेंगे? पूर्व में एक प्रतिबद्ध नौकरशाह जगमोहन को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया गया था। उन्होंने वहां काफी हद तक आतंकवाद पर नियंत्रण कर लिया था, परंतु राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते उनको वापस बुला लेना आतंकवादियों के लिए वरदान साबित हुआ। एक बार फिर जब सेना के कानूनी अधिकारों में कटौती की बात चल निकली है, तो ऐसा कोई कदम कश्मीर समस्या के समाधान के बजाय आत्महत्या का ही रूप लेगा। सेना, अर्धसैनिक बलों व स्थानीय पुलिस को विशेष अधिकार देकर ही कश्मीर में फैले उग्रवाद पर काबू पाया जा सकता है। कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाने की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए और कश्मीर को दिए जाना वाला आर्थिक पैकेज भी निरस्त कर दिया जाना चाहिए। बिना सख्ती किए, अलगाववादियों को रास्ते पर नहीं लाया जा सकता।
मनोज शर्मा, हरिद्वार

एकजुट हो यूपीए
अभी हाल ही में संपादकीय पेज पर छपे लेख ‘प्रशासकीय चुनौतियों से जूझता देश’ पढ़ा। एन.के. सिंह ने पूरे लेख में हमारे देश की समस्याओं पर एक बार फिर हमारा ध्यान केंद्रित किया है। जैसे आंतरिक सुरक्षा की बढ़ती चुनौती, कूटनीतिक मोर्चे पर मिलते आघात, खाद्य सुरक्षा की मुश्किलें, बदतर होते केंद्र-राज्य संबंध और शासन में लचीलेपन की कमी। वाकई भारत मजबूत अर्थव्यवस्था पर आधारित ऊंची विकास दर और कमजोर शासन का मिश्रण है, लेकिन मुझे बस इतना ही कहना है कि अगर समय रहते सरकार में आंतरिक एकता उत्पन्न नहीं हुई, तो आने वाले वक्त में विपक्षी पार्टियों को इसका लाभ मिलेगा। यूपीए सरकार सत्ता से बाहर होगी और विपक्ष सत्ता में होगा।
पूजा सिंह, देहरादून

बाल मजदूरी बनी अभिशाप
बाल मजदूरी के खिलाफ सरकार ने कठोर कानून तो बना दिए हैं, मगर उन पर अमल करने में वह खुद नाकाम साबित होती रही है। ढाबों, होटलों व कारखानों आदि में बड़ी संख्या में बच्चों काम कर रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि सरकार व प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं है, फिर भी इस तरह के मामलों को अनदेखा कर दिया जाता है।  सरकार ने शिक्षा का अधिकार नियम तो लागू कर दिया है, लेकिन शिक्षा ग्रहण करने की उम्र में बच्चों बाल मजदूरी की चक्की में पिस रहे हैं। कहीं गरीब माता-पिता अपने बच्चों को कमजोर माली हालत के चलते काम पर लगा देते हैं तो कहीं ठेकेदार, ढाबा मालिक और फैक्टरियों के मालिक बच्चों को जबरन काम पर रख लेते हैं। बाल श्रम विरोधी कानून तभी पूरी तरह से सफल हो पाएगा, जब बाल मजदूरी में लगे बच्चों को इससे मुक्त करवा कर उन्हें शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ा जाए। इसके लिए सरकार को बनाए गए नियमों को सख्ती से लागू कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी।  हमें इस बात को भी ध्यान में रखना होगा कि बाल श्रम जैसे बुराइयों को मिटाए बिना देश विकास के पथ पर आगे नहीं बढ़ पाएगा।
देश राज शर्मा, विकासनगर   

 

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