DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सामूहिकता में खिलता नृत्य

सामूहिकता में खिलता नृत्य

राष्ट्रीय स्तर पर कथक नृत्य की प्रमुख संस्था कथक केंद्र नृत्य प्रशिक्षण के साथ राजधानी और अन्य शहरों में कथक नृत्य के कई आयोजन पिछले तीस सालों से कर रहा है। इन आयोजनों की श्रृंखला में एक नया आयोजन है, नृत्य-संरचनाओं की प्रस्तुति। इसे केंद्र की रेपर्टरी के कलाकार समूह नृत्य में प्रस्तुत करते हैं।

हर साल की तरह इस बार दो दिन का यह आयोजन कमानी सभागार में हुआ। इन दिनों प्रदर्शनकारी कलाओं के क्षेत्र में कुछ नया कर दिखाने में एक बड़ा उत्साह कलाकारों में दिख रहा है और पिछले कई सालों से मंच पर नए प्रयोगों का सिलसिला चल रहा है, पर इस प्रवृत्ति का एक जीवंत और सृजनशील कार्य करने में केंद्र के युवा कलाकारों ने एक साहसिक प्रयास किया है।

कार्यक्रम का आरंभ कथक नर्तक और संरचनाकार जयकिशन महाराज द्वारा नृत्य संरचना क्रमश: नाद गुंजन, घुंघरू संगीत और आनम्य की प्रस्तुति से हुई। इन संरचनाओं की संकल्पना से लेकर संगीत रचना में एक गहरी सोच सुविख्यात नृत्यकार पंडित बिरजू महाराज की है। उसे एक नया रंग देकर उनके जेष्ठ पुत्र जयकिशन महाराज ने साकार करने में एक सराहनीय प्रयास किया है।

देखने से लगा कि जयकिशन भी अपने पिता की तरह कुशल रचनाधर्मी और सृजनशील कलाकार हैं। क्रमश: की परिकल्पना उस रहस्य को खोलती है, जिसमें सारी सांसारिक गतिविधियां संचारित होती हैं, उसी में नृत्य की लय, संरचना की बंदिश और विलंबित से लेकर द्रुत की गति समाहित है। पारंपरिक कथक नृत्य पर आधारित इस प्रस्तुति में नाच की खूबसूरती, कलाई का घुमाव, हस्तक के आकार और अंग संचालन में अच्छी चमक थी।
नाद-गुंजन बिरजू महाराज की एक बहुत ही कलात्मक और लोकप्रिय संरचना है। विविध वाद्य नक्कारा, नाल, तबला, ढपली, मंजीरे के गुंजन पर इसे विविध ताल और लय के घरातल पर जिस कलात्मकता और खूबसूरती से सजाया गया, वह वाकई में बेजोड़ है। थिरकती लय और विविध वाद्यों के गुंजन पर समूह नृत्य की प्रस्तुति ने दर्शकों को सराबोर कर दिया।

घुंघरू संगीत में संगीत के स्वर और बोलों के बीच जो तानाबाना था वह बहुत मर्मस्पर्शी था। इस प्रस्तुति में वे सभी खूबियां थीं जो पंडित बिरजू महाराज की कल्पना से प्रसूत हुई हैं। आखिर में एक लोहे की छड़ी की आत्मकथा पर आधारित आनम्य की दार्शनिक कथा के भाव को एकल और समूह नृत्य से उजागर करने में जो संरचना बिरजू महाराज की थी, वही जयकिशन की प्रस्तुति में भी था। इन प्रस्तुतियों में शैलजा नलवडे, नम्रता, विद्यालाला, मुल्ला अफसर, महेन्द्र परिहार, दीपक और इशानी ने अपने नृत्य और अभिनय की गहरी छाप छोड़ी।

कथक केंद्र में एक वरिष्ठ गुरु की हैसियत से जुड़ी गीतांजलि लाल केंद्र की रेपर्टरी की भी निर्देशक हैं। उनके द्वारा कथक में संरचित ‘द स्पिरिट’ और ‘अंदाजे तरन्नुम’ पूरी तरह पारंपरिक कथक पर आधारित था।  ‘द स्पिरिट’ की परिकल्पना में उस शक्ति का आह्वान है, जो स्पेस और समय की सीमा को निर्धारित करता है, समय की गति की तरह इस अमूर्त संसार में लय और ध्वनि का बिना किसी सीमा में बंधा हुआ जो फैलाव है, वह किस रूप में कथक को प्रभावित करता है, उस कल्पना को संरचना के जरिए साकार करने में गीतांजलि लाल ने अपनी रचनाधर्मिता साबित की। दस मात्र की झपताल और सोलह मात्र की तीनताल पर नृत्य के विविध चलन, शुद्ध नृत्य के प्रकार, तत्कार, लयबांट, लयकारी के तिलस्मी रंग समूह और एकल नृत्य में बिखरे।

‘अंदाजे तरन्नुम’ में मुगलिया दरबारी नृत्य की झलक एक खूबसूरत अंदाज में गीता जी ने पेश की। नाच में नक्स, भावाभिव्यक्ति आदि की अदायिकी में दरबारी नृत्य की मोहक झलकें थीं। तोड़े-टुकड़े  तत्कार, गत निकास-भाव आदि को पेश करने में रेपर्टरी के कलाकारों ने दर्शकों को मोह लिया।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:सामूहिकता में खिलता नृत्य