DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

यह हिन्दुस्तान का इम्तिहान है

सनसनी के सौदागर लौट आए हैं। उन्होंने अपनी जंग खाई और मुर्झाई सोच को फिर से खाद-पानी देना शुरू कर दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने साफ कर दिया है कि वह दशकों से चले आ रहे अयोध्या मसले पर अगली 24 सितम्बर को फैसला सुनाने जा रही है। इन लोगों के लिए इतना ही काफी है। वे मौका नहीं गंवाना चाहते।

हालांकि, तमाम आशंकाओं की कालिख के बीच आशा के कुछ फूल भी खिल रहे हैं। पहले उम्मीद की बात। पिछली सदी के आखिरी दशक में सिर्फ संघ परिवार ही नहीं बल्कि हुक्मरां भी आग में घी डालने का काम कर रहे थे। कोई कहता था कि मंदिर मेरी लाश पर बनेगा तो कोई खुलेआम चुनौती देता था कि अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता। इससे उत्तेजना दबने के बजाय और बढ़ गई। नतीजा सबके सामने है।

इस बार लखनऊ से लेकर नई दिल्ली तक की सरकारें मामले को शांत करने पर लगी हैं। मीडिया के बहुत बड़े तबके ने भी खासा सकारात्मक रुख धारण कर रखा है। खुद बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी और संघ परिवार के लोगों के सुर बदले हुए हैं। ये वही लोग हैं, जो बीस साल पहले अंगारों की खेती कर रहे थे। अब वे समझ गए हैं कि वर्तमान भारतीय समाज में इन तेवरों के खरीददार कम लोग रह गए हैं। यह प्रगतिशील और तरुण भारत का वह चेहरा है, जिस पर गर्व किया जा सकता है।

अब अलगाव फैलाने वालों पर आते हैं। यह ठीक है कि भारत बदल गया है, पर यह भी सच है कि अभी पुरानी प्रतिक्रियावादी ताकतें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। उनके दांत और नाखून कमजोर भले ही हो गए हैं पर वे बरसों से मौके की तलाश में थे कि कब इन पर नई सान चढ़ाई जा सके। उन्हें लगता है कि वह अवसर आ गया है।

वे कितने खोखले हैं इसका एक उदाहरण। एक समय था जब छ: दिसम्बर 92 को अयोध्या में मारे गए लोगों को भगवा ब्रिगेड के लोग ‘शहीद’ कहा करते थे। आज उन तथाकथित शहीदों के परिवार गम और गुरबत की जिंदगी गुजार रहे हैं। इस हादसे के वास्तुकार अब उनके घरों की तरफ झांकते तक नहीं।

जरा उन लोगों पर भी ध्यान दीजिए जो इसके बाद होने वाले भीषण दंगों में मारे गए। इनमें से ज्यादातर का मंदिर या मस्जिद से कोई लेना-देना नहीं था। वे सामान्य लोग थे, जो अपने देश में खुशहाल जिंदगी जीने के तलबगार थे, पर उन्हें त्रासद मौत मिली। दुख तो इस बात का है कि इतना बड़ा दुख उठाने के बावजूद इन लोगों के परिवारजन चेते नहीं। वे सांप्रदायिकता के खिलाफ उठकर खड़े नहीं होते। यही वजह है कि खून की होली खेलने वाले फिर से अपने नापाक मंसूबे का साहस संजो पा रहे हैं।

चिन्ता की बात है कि लोग उनसे अभी भी डरते हैं। एक उदाहरण। पिछले शुक्रवार को एक संपादकीय सहयोगी अपने दौरे की प्रस्तावना लेकर मेरे पास आए। उन्हें 24 तारीख को बिहार के किसी शहर में रहना है। चलते-चलते उन्होंने बताया कि सुबह ही उनकी पत्नी कह रही थीं कि अफवाह फैल रही है कि उस दिन बहुत बड़ा बवाल हो सकता है। आप घर से बाहर मत जाइए। हम सबको ऐसे समय पर साथ रहना चाहिए।

इस विकासशील देश में लाखों लोग प्रतिदिन किसी न किसी काम से दौरे पर रहते हैं। अगर हर कोई यही सोचने लग गया कि इस दिन घर से बाहर न निकला जाए तो देश की तरक्की का क्या होगा? आशंकाओं की खेती तो कभी भी बोई जा सकती है।

जो लोग गर्व से यह बताते हैं कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे तेजी से उभरता हुआ मुल्क है, उनके लिए भी यह विचार का समय है। अब 1992-93 जैसे हालात नहीं रहे हैं। देश में बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश हो चुका है। अगर दंगे भड़के तो परदेसी लोग भारत आने में हिचकिचाएंगे और विकास की रफ्तार पर ब्रेक लग जाएगा। 

वैसे भी देश इन दिनों दुर्दिन झेल रहा है। कश्मीर का अलाव ठंडा पड़ने के बजाय निरंतर धधकता जा रहा है। माओवादी हर रोज पहले के मुकाबले आगे बढ़ते चले जा रहे हैं। खबर छपी है कि वे बिहार की जेलों पर हमला बोल सकते हैं। ऐसा कर पता नहीं वे क्या साबित करना चाहते हैं? उनका यह करतब उत्तेजना फैला सकता है। सरकार के प्रति अस्थायी अविश्वास जगा सकता है पर वह सम्मान नहीं दिला सकता, जो बस्तील की जेल तोड़ने पर फ्रांसीसी राज्य क्रांति के कर्णधारों को मिला था। उनके मकसद जुदा हैं। फिर भी कोशिशें जारी हैं। 

पुराने दांवों को नए तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है। पिछले हफ्ते पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में अजीबो-गरीब खबरें फैलाई गईं। किसी के पास एसएमएस आया कि जलजला आ रहा है, तो कहीं नदियों में उफान की खबर उड़ाई गई। लोग रात-रात भर नहीं सोए। क्या यह उन्हीं लोगों का कारनामा है जिन्होंने कभी गणेशजी को दूध पिलाया था? क्या वे आजमाना चाहते हैं कि अफवाहें उनके काले इरादों के लिए किस तरह एक बार फिर हथियार बन सकती हैं? क्या वे लोग फिर से अपने मकसद में सफल होंगे?

याद करें। अयोध्या उत्तेजना के दौर में लोगों में गुस्सा फैलाने के लिए तमाम तमाशे आयोजित किए गए थे। कुछ शहरों में औरतों और बच्चों की चीख-पुकार की आवाजें आने लगती थीं। ऐसा लगता था जैसे बौराई भीड़ ने उन पर जानलेवा हमला कर दिया है। बाद में पुलिस ने ऐसे कैसेट जब्त किए थे, जिनमें  इस तरह की स्वर लहरियां भरी गई थीं। अकसर यह आवाजें मिश्रित आबादी वाले मोहल्लों के आसपास सुनाई पड़ती थीं।

ध्यान रखिए। अब जमाना बदल गया है। आपके पास किसी भी खबर की तस्दीक करने के बहुत से जरिए हैं। भावावेश में आने से पहले अगर हम विवेकपूर्वक इनका इस्तेमाल करेंगे तो अफवाह और समाचार के बीच का अंतर जान सकेंगे। इतना जान लेना ही देश और समाज को बचाने के लिए काफी होगा।

यह बेहद जरूरी है क्योंकि इस अजीब दौर में जब अमेरिका का एक अनाम पादरी कथित तौर पर कुरान शरीफ की बेइज्जती करता है, तो कश्मीर में दंगे भड़क उठते हैं और 19 लोग एक ही दिन में मारे जाते हैं। यह भी ध्यान रखिए अगर टीवी पर कोई फुटेज दिखाया जा रहा है तो उसकी सत्यता को जानने के तमाम तरीके हैं। 

सबसे पहले आप यह देखिए कि इसे चलाने वाला कोई नामचीन चैनल है या फिर टटपुंजिया। खबर सही होगी तो सारे चैनलों पर चलती नजर आएगी। जब दुनिया के पैमाने पर आतंकवाद एक सुनियोजित साजिश के तहत फैलाया जा रहा हो तो भारत सहनशीलता की नई परिभाषा दुनिया के सामने पेश कर सकता है। हमारे पुरखों ने कभी शांति का संदेश दिया था। आप भाईचारे की मिसाल कायम कर अपने पूर्वजों का नाम रोशन कर सकते हैं। मत भूलिए। यह इम्तिहान भारतीयता का है, हमारा - आपका है।

shashi.shekhar@hindustantimes.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:यह हिन्दुस्तान का इम्तिहान है