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मैं तो ऐसा नहीं

घर लौटते हुए भी ऑफिस उनसे साथ चिपका हुआ था। आज किसी साथी ने उनके बारे में ऐसी बात कह दी थी जिसे वह सोच ही नहीं सकते थे। वह तो अपने को काफी लचीला समझते थे लेकिन..

कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी के प्रोफेसर टॉमस गिलोविच मानते हैं कि ‘हमारे भीतर ऐसा बहुत-कुछ होता है, जिसे हम जान नहीं पाते। और दूसरा जब उस पर उंगली रखता है, तो हम सहन नहीं कर पाते।’ टॉमस इसी को अपना ‘ब्लाइंड स्पॉट’ कहते हैं।

हमारी अपने बारे में एक धारणा होती है। धीरे-धीरे वह बन जाती है। फिर उसी में हम कैद भी हो जाते हैं। अगर उसी के आसपास कोई हमें आंकता है, तब तो ठीक है, लेकिन उससे जरा भी इधर-उधर होने पर हम उखड़ जाते हैं।

हम दूसरों से तो चाहते हैं कि वे लचीले हों। वह बदलाव के लिए हमेशा तैयार हों। कम से कम दूसरों की सुनने की हिम्मत रखें। पर खुद में हम कोई बदलाव नहीं चाहते। अपने में बदलाव कोई मामूली बात नहीं है। अगर उसमें कोई बदलाव करना है, तो पूरी सोच ही बदलनी पड़ती है। उसके लिए हमें अपना ही आकलन करना होता है। अपने भीतर जाने का जोखिम उठाना पड़ता है। अपनी ही पड़ताल करनी पड़ती है।

दरअसल, जब पहली बार कोई आपको टोकता है। कुछ ऐसी बातें बोलता है, जिसे हम सुनना नहीं चाहते या हमें लगता नहीं कि वह हमारे बारे में कह रहा है। उस हाल में हमें अपना ही आकलन करना चाहिए। अपने को अलग रख कर अपना ही हिसाब-किताब करना चाहिए। ऐसा करके ही हम अपने को बदल सकते हैं। अपनी कमियों को दूर कर सकते हैं।दूसरे जो हमारे बारे में सोचते हैं, उसकी परवाह करनी ही चाहिए। एक बार तो उस पर गंभीरता से सोचना ही चाहिए।

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