DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

खतरनाक चाल

हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता सैयद अली शाह गिलानी कश्मीर को पूरी तरह आग में झोंकने पर आमादा हैं। सर्वदलीय बैठक को विफल बताकर गिलानी ने दिन में आंदोलन और रात में काम करने का नया कैलेंडर जारी करने के साथ सेना से टकराव का हथकंडा भी अपना लिया है।

उन्होंने आगामी मंगलवार को सेना के शिविरों की तरफ लोगों के मार्च करने और उनके बाहर धरना देने की अपील जारी कर ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें सेना और जनता का सीधे टकराव होने का खतरा बढ़ गया है।

कश्मीर में जगह-जगह, यहां तक कि रिहायशी इलाकों के बीच जिस तरह से सेना के बंकर बने हैं और सेना के ट्रक और वाहन गुजरते रहते हैं, उसमें अगर गिलानी की अपील पर अमल हुआ तो काफी खूनखराबा हो सकता है, क्योंकि गिलानी की शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अपील करने का मतलब कोई महात्मा गांधी का सत्याग्रह आंदोलन नहीं है। एक तो युवा उनके नियंत्रण में नहीं हैं, दूसरे वे धार्मिक कट्टरपंथ के असर में पथराव को पवित्र आंदोलन मान चुके हैं।

अगर टकराव किसी तरह से टाल भी लिया गया तो भी इससे ऐसा माहौल बनेगा जिसमें सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (एफस्पा) को हटाना तो दूर, उसमें ढील देना भी कठिन हो जाएगा। इसके संकेत उस समय मिलने लगे जब इस कानून को हटाने की मांग कर रही जम्मू-कश्मीर की सरकार भी प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए सेना की मदद लेने की तैयारी करने लगी।

मतलब साफ है कि गिलानी जो मांग कर रहे हैं, वह वे वास्तव में चाहते नहीं। वे स्वयं पाकिस्तान के जिस शिकंजे में फंसे हुए हैं, उसी में उन्होंने कश्मीर की जनता, विशेषकर युवाओं को उसमें फंसाया है और अब सरकार और सेना को भी उसमें घसीट रहे हैं।
  
इस तरह की लड़ाइयां आजादी की तरफ जाना तो दूर स्वायत्तता या जनता के बुनियादी अधिकारों की तरफ भी नहीं जा पातीं। हालांकि सरकार सर्वदलीय बैठक में किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाई और इसी को बहाना बनाकर अलगाववादी कह रहे हैं कि उनके पास आंदोलन जारी रखने के अलावा कोई चारा नहीं है। इसके बावजूद अगर घाटी की हकीकत को जानने-समझने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल सोमवार को वहां जा रहा है तो कम से कम उससे बातचीत करने और जनता का दर्द समझने देने का मौका तो देना ही चाहिए था।

अलगाववादी इसी बात से डरते हैं कि अगर कहीं जनता समझने-समझाने के चक्कर में पड़ गई तो उसका हिंसा का जुनून ठंडा पड़ जाएगा। इसी जुनून को ठंडा करना और समझदारी की बहाली सरकार का पहला फर्ज होना चाहिए।

यह प्रयास राजनीतिक दलों की तरफ से भी होना चाहिए और समाज की तरफ से भी। जम्मू के मेंधर में विभिन्न धार्मिक समुदाय के लोगों ने मुस्लिम युवकों के मारे जाने पर पारस्परिक एकता और समझदारी का परिचय दिया है, वही समझदारी घाटी में लोगों को हिंसा से दूर ले जाने के लिए उभरनी चाहिए। 

कारोबारी वर्ग इस हिंसा से ऊब चुका है, पीडीपी भी शांति बहाली में केंद्र सरकार से सहयोग करने को तैयार है। हुर्रियत के भीतर भी ऐसे लोग होंगे जो सेना से टकराव और हिंसा को टालना चाहते होंगे। सरकारों को हर स्तर पर ऐसे संगठनों और लोगों से संपर्क करना चाहिए और गिलानी की खतरनाक चाल को नाकाम करना चाहिए।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:खतरनाक चाल