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मोको कहां ढूंढे रे बन्दे..

‘परमात्मा ने इस ब्रह्मांड को नहीं बनाया’- स्टीफन हॉकिंग ने हाल में प्रकाशित अपनी नई पुस्तक ‘दि ग्रैंड डिजाइन’ में यह बात कही है। इसने धर्म और विज्ञान जगत में खासा हड़कम्प मचा दिया है। उन्होंने तर्क दिया है कि जगत में गुरुत्वाकर्षण का नियम है। उसके आधार पर ब्रह्मांड अपने को ‘न-होने’ (नथिंग) में से पुन: निर्मित कर सकता है और करता रहेगा। पर वैज्ञानिक की सीमा उसकी बुद्धि है और ईश्वर बुद्धि से परे शाश्वत और असीम है, यह मानना है धर्म-अध्यात्म से जुड़े विद्वानों का :

बुंद समानी समुंद में सो कत हेरी जाय
स्वामी चैतन्य कीर्ति

वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ब्रह्मांड के निर्माण अथवा उसे चलाने में परमात्मा की कोई भूमिका स्वीकार नहीं करता। वह करे भी कैसे? क्या यह वैज्ञानिक अथवा कोई भी वैज्ञानिक अपने भीतर ध्यान में उतर कर अपनी ही आत्मा की अनुभूति करता है, जैसे बुद्ध, महावीर, जीसस, गुरुनानक, कबीर जैसे रहस्यदर्शियों ने की। जो व्यक्ति अपनी आत्मा को ही स्पर्श नहीं कर पाता है, अपनी ही चेतना की प्रत्यभिज्ञा नहीं कर पाता है, उससे यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह परमात्मा की प्रतीति कर सकता है?

वह फिजिक्स जानता है, गणित जानता है तथा विज्ञान की अनेक खोजों से भलीभांति परिचित है, लेकिन उसका यह जानना उसके मस्तिष्क की सीमा के भीतर बने रहते हुए असीम ब्रह्मांड के रहस्यों को उद्घाटित कर सकता है? बूंद सागर को अपने भीतर कैसे समाहित कर सकती है। इस कार्य में तो केवल वे ही समर्थ हो पाते हैं जो अपनी सीमा को असीम में समर्पित करने का साहस करते हैं; जैसे कबीर..जो उद्घोष करते हैं : बुंद समानी समुंद में सो कत हेरी जाय।

बूंद में उतना ही परमात्मा है जितना समुद्र में, कोई गुणात्मक फर्क नहीं, केवल परिमाणात्मक फर्क है। लेकिन सागर होने के लिए बूंद को अपने को सागर में छोड़ देना पड़ता है। पूर्ण का पूर्ण का मिलन होता है और अस्तित्व अपने रहस्यों को खोल देता है। ईशावास्य उपनिषद का सूत्र है :

ऊँ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादया पूर्णमेवावशिष्यते। ऊँ शांति: शांति: शांति:।
अर्थात् ऊँ वह पूर्ण है और यह भी पूर्ण है; क्योंकि पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होती है तथा पूर्ण का पूर्णत्व लेकर पूर्ण ही बचा रहता है। ऊँ शांति: शांति: शांति:।

पूर्ण से पूर्ण का उत्पन्न होना यह सत्य मस्तिष्क को सामान्य तल पर समझ नहीं आ सकता, क्योंकि यह गणित के ऊपर की बात है। ओशो समझाते हैं : जिंदगी साधारण गणित नहीं है। बहुत श्रेष्ठतर, गहरा, सूक्ष्म गणित है। ऐसा गणित है जहां आंकड़े बेकार हो जाते हैं। जहां गणित के जोड़ और घटाने के नियम बेकार हो जाते हैं। और जिस आदमी को गणित के पार, जीवन के रहस्य का पता नहीं है, उस आदमी को जीवन का कोई भी पता नहीं है।

जब आप किसी को प्रेम देते हैं, तो आपके पास प्रेम कम होता है? आप पूरा ही प्रेम दे डालते हैं, तब भी आपके पास कुछ कमी हो जाती है? नहीं।  आदमी के पास इस सूत्र को समझने के लिए जो निकटतम शब्द है वह प्रेम है। ..पूर्ण से पूर्ण निकल आए और पीछे पूर्ण ही शेष रह जाए, तो इसका अर्थ हुआ कि वह गणित से नहीं समझाया जा सकेगा, प्रेम से समझना पड़ेगा। इसके लिए जो आइंस्टीन के पास समझने जाएंगे, वे नहीं समझ पाएंगे। मीरा के पास समझने जाएं, चैतन्य के पास समझने जाएं, तो शायद समझ में आ जाए।

इसी प्रेम के रहस्य को डूबकर समझने में, बूंद के अंतर्निहित रहस्य की अनुभूति के आधार पर समूचे अस्तित्व, ब्रह्मांड की अनुभूति संभव है। ओशो कहते हैं कि परमात्मा का अर्थ है: सारी चीजों के भीतर जो है-पन, वह जो इजनेस, जो एक्जिस्टेंस है, जो अस्तित्व है, जो होना है-वही। कितनी ही चीजें बनती चली जाएं, उस होने में कुछ जुड़ता नहीं। और कितनी ही चीजें मिटती चली जाएं, उस होने में कुछ कम होता नहीं। वह उतना का ही उतना, वही का वही-अलिप्त और असंग, अस्पर्शित। परमात्मा की पूर्णता अनंत पूर्णता है। अनंत पूर्णता का अर्थ है कि उसमें से अनंत पूर्ण प्रकट हो सकते हैं। एक-एक व्यक्ति पूरा का पूरा परमात्मा है। एक-एक अणु पूरा का पूरा विराट है।

निष्कर्ष में हम यह कह सकते हैं कि परमात्मा इस जगत से अलग नहीं है, वह कण-कण में, अणु-अणु में समाया है। वह समूचे जगत का ब्रह्मांड का है-पन है, उससे पृथक नहीं। वह स्वयं अपना सृजन कर रहा है और स्वयं में लीन हो रहा है। परमात्मा ने जगत को बनाया है, क्योंकि उसमें वह स्वयं बनता है; आकार बनते हैं मिटते हैं, लेकिन उनका है-पन, सदा सनातन है।

सत्ता और कर्ता अलग हैं
डॉ. अनेकान्त कुमार जैन
हाल ही में स्टीफन हॉकिंग ने अपने नए अनुसंधान में दावा किया है कि ईश्वर सृष्टि का कर्ता नहीं है। हिन्दू ईश्वर या भगवान को, मुसलमान अल्लाह को और ईसाई गॉड को जगत का नियन्ता मान कर निश्चिंत बैठे थे। इनमें आपस में अन्य मतभेद भले ही हों, किन्तु सृष्टि का कर्ता-धर्ता और सिर्फ सृष्टि का ही नहीं, वरन स्वयं के भी हर अच्छे-बुरे का कर्ता-धर्ता ये भगवान, अल्लाह या गॉड को ही मानते हैं। भगवान, अल्लाह या गॉड की मर्जी के बिना एक पत्ता भी हिल नहीं सकता- ये एक आम अवधारणा है।

प्रश्न यह है कि ईश्वर कर्त्तव्य का निषेध कर देने मात्र से क्या ईश्वर की सत्ता को समाप्त माना जा सकता है? इस विषय पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है। भारतीय दर्शन के प्राचीनतम स्वरूप पर ध्यान दें तो हम पाएंगे कि अधिकांश भारतीय दर्शन अपनी आरम्भिक दशा में ईश्वर को सृष्टि का कर्ता-धर्ता स्वीकार नहीं करते थे।

निरीश्वर सांख्य दर्शन के अनुसार वस्तु व्यवस्था का आदिकारण प्रकृति है, ईश्वर नहीं। परमाणुवादी वैशेषिक दर्शन ने भी आरम्भिक दशा में परमाणुओं की गति से सृष्टि का निर्माण माना है, ईश्वर से नहीं। मीमांसा दर्शन भी आरम्भिक दशा में ईश्वर को कारण नहीं मानता था। स्वयं के कर्म ही फल देते हैं, ऐसा मानता था। बाद में उत्तर मीमांसा ने कर्म फल दिलवाने वाले के रूप में ईश्वर को माना।

बौद्घों ने ईश्वर की सत्ता ही स्वीकार नहीं की, तो कर्ता-धर्ता कैसे मानते? जैन दर्शन अपने-अपने कर्म फल पर विश्वास करता है। ये परमात्मा की सत्ता स्वीकार करते हुए भी उसे सृष्टि का कर्ता-धर्ता स्वीकार नहीं करते और न ही यह मानते हैं कि ईश्वर हमारा भला-बुरा करता या करवाता है। वह तो मात्र जानता-देखता है,सर्वज्ञ है और चिदानंद में रहता है।

कहने का तात्पर्य हमारे धर्म तथा दर्शन की आधारशिला ईश्वर, कर्त्तव्य जैसी अवैज्ञानिक मान्यताओं मात्र पर नहीं टिकी है कि यदि वह हिला दी जाए तो धर्म-दर्शन औंधे मुँह गिर पड़ेंगे। हाँ, स्टीफन हॉकिंग के नए अनुसंधान हमें इस बात पर विचार विमर्श करने को अवश्य मजबूर करते हैं कि हम अपनी नींव जरूर जाँच लें कि कहीं उसमें अंधविश्वास और अवैज्ञानिकता की काई या दीमक तो नहीं लग गई है?

अल्लाह को प्रमाण चाहिए?
डा. कल्बे सादिक
ईश्वर के अस्तित्व या उसके द्वारा सृष्टि की रचना के संबंध में प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग द्वारा हाल ही में प्रतिपादित थ्योरी में कोई नई बात नहीं है। पहले भी हॉकिंग जैसे वैज्ञानिक और अन्य लोग इस तरह के सवाल उठाते रहे हैं। दरअसल यह पूरा मामला अप्रोच का है।

इसे एक उदाहरण से यूं समझा जा सकता है कि अगर आप आईने में अपना चेहरा देख रहे हैं तो आप को अपने चेहरे के दाग-धब्बे नजर आ जाएंगे, लेकिन अगर आईना देखते समय आप की नजर अपने चेहरे पर न होकर सिर्फ आईने पर है तो चेहरा सामने होते हुए भी आप वह दाग-धब्बे नहीं देख सकेंगे। यानी अगर आप की अप्रोच ही गलत है तो फिर आप सही निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते।

भौतिक आधार पर सृष्टि को समझने का भी यही मामला है। अगर आप सही अप्रोच के साथ रिसर्च कर दुनिया और प्रकृति के रहस्यों को जानने का प्रयास कर रहे हैं, तो एक-एक कण में उस ईश्वर या अल्लाह की निशानियां मौजूद हैं और इसे प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि मामला सिर्फ दृष्टिकोण का है। हॉकिंग बड़े और सम्मानित वैज्ञानिक हैं, लेकिन उनके दृष्टिकोण और रिसर्च पर भौतिकता हावी है।

जबकि दूसरी ओर महान वैज्ञानिक आइन्सटाइन ने कहा कि जब हम इस पूरे ग्लोबस को देखते हैं तो वहां एक असीमित ब्रह्मांड मौजूद है, लेकिन जब हम इसमें एटम से लेकर सोलर सिस्टम तक पर निगाह डालते हैं तो पता चलता है कि यह पूरा सिस्टम फ्लालेस सिस्टम अपने आप पैदा हो जाएगा, जैसा कि स्टीफन हॉकिंग का दावा है।

इसी बात को पवित्र कुरान मजीद में ‘सूरए मुल्क’ में इस तरह कहा गया है कि तुम बार-बार पूरी सृष्टि पर नजर डालो और तुम्हारी नजर थक-थक वापस आ जाएगी, लेकिन तुम्हें हमारे (अल्लाह के) सिस्टम में कहीं कोई कमी नजर नहीं आएगी। तो कुरान में 1500 बरस पहले अल्लाह ने सृष्टि के बारे में जो कहा था उसे आइन्सटाइन ने भी दोहराया। लेकिन मामला दरअसल देखने वाले के दृष्टिकोण का है। अगर आप का दृष्टिकोण सही है तो प्रकृति की हर रचना में अल्लाह या ईश्वर का जलवा नजर आ जाएगा और इसे प्रमाणित करने के लिए किसी सबूत की जरूरत नहीं पड़ेगी।
प्रस्तुति-नजमा नकवी

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