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गया : पितृ-तृप्ति का तीर्थ

कुछ ऐसे भी तीर्थ हैं जहां जाने पर स्वयं को, स्वयं के परिजन का और उसके साथ-साथ पूर्वजों को भी श्रीलाभ मिलता है। ऐसा ही तीर्थ है गया जिसे ‘पितृतीर्थ’ व ‘मोक्ष भूमि’ के रूप में अलंकृत किया जाता है और श्रद्धा व आदर के कारण ‘गया जी’ के नाम से दूर-दूर देश में जाना जाता है। शास्त्रों में पितृपक्ष में गया यात्रा का वर्णन है।

बाल्मीकि रामायण, आनन्द रामायण, महाभारत, आठ पुराण, स्मृति और उपनिषद् आदि में गया की महिमा का गुणगान किया गया है। विवरण है कि गया जाने मात्र से ही पितृगण हर्षित हो मनचाहा वर प्रदान करते हैं। ऐसे तो गया में सालभर पितृ-भक्तों का जमावड़ा लगा रहता है पर पितृपक्ष को इस कार्य के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना गया है जो आश्विन माह का कृष्ण पक्ष हुआ करता है।

महाभारत, वायुपुराण, मत्स्यपुराण और अत्रि संहिता में कहा गया है कि गया आदि तीर्थो में जाने से पितृगण भी तर जाते हैं। वे सर्वदा यह कामना करते हैं कि हमारे कुल में कोई ऐसा उत्पन्न हो जो गया जाए, नील वृष का उत्सर्ग करे अथवा अश्वमेघ करे।

गया में श्राद्ध, पिंडदान व तर्पण का अनुष्ठान आदि युग से हो रहा है जिसके श्रीगणेश का श्रेय युगपिता ब्रह्माजी  को जाता है। विवरण है कि कोटि-कोटि देववृन्द की उपस्थिति में ‘गया’ नामक वैष्णव असुर के शरीर पर हुए यज्ञ क्रम में श्री विष्णु भगवान द्वारा गयासुर को अचल करने के उपरांत यहां श्राद्ध पिंडदान का आशीर्वाद दिया जो इस घोर कलियुग में भी निरंतर व निर्बाध रूप से जारी है। सचमुच गया यात्रा करने वाला स्वयं अपने आप को अपने आने वाली पीढ़ी को और अपने समस्त पूर्वजों को तृप्त कर जाता है तभी तो हिन्दू के मन में जीवन में एक बार गया जाने की अभिलाषा बलवती रहती है।

श्राद्ध और पितर
आधुनिक व्यक्ति चाहे न माने परंतु यह सत्य है कि समाज में आज भी पितरों को दोष, भूत-प्रेतों के प्रकोप देखने को मिलते हैं। इनमें रोचक बात कभी-कभी देखने को मिलती है कि भूत-प्रेत स्वयं कहते हैं कि ‘हमारा उद्धार कराया जाए।’

श्राद्धों का पितरों के साथ अटूट संबंध है। पितरों के बिना श्राद्धों की कल्पना तक नहीं की जा सकती। श्राद्ध पितरों को आहार पहुंचाने का केवल पात्र माध्यम है। मृत व्यक्ति के लिए जो श्रद्धायुक्त होकर पिर्तण, पिण्ड, दानादि किया जाता है, उसे श्राद्ध कहा जाता है। जिस मृत व्यक्ति के एक वर्ष तक के सभी और्ध्व दैहिक क्रिया कर्म संपन्न हो जाएं, उसी की पितर संज्ञा हो जाती है।

20 अंश रेतस् (सोम) को पितृऋण कहते हैं। 28 अंश रेतस् के रूप में श्रद्धा नामक मार्ग से भेजे जाने वाले पिण्ड तथा जल आदि के दान को श्राद्ध कहते हैं। इस श्रद्धावान मार्ग का संबंध मध्याह्न काल में श्राद्ध करने का विधान है। श्राद्ध किसी दूसरे के घर में, दूसरे की भूमि में कभी न किया जाए। जिस भूमि पर किसी का स्वामित्व न हो, सार्वजनिक हो, ऐसी भूमि पर श्राद्ध किया जा सकता है।

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