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औरंगाबाद में इस बार बड़ी होगी नक्सली चुनौती

औरंगाबाद, निज प्रतिनिधि

इस बार के विधानसभा चुनाव प्रशासन के लिए खासे चुनौतीपूर्ण हैं क्योंकि उसे इस बार नक्सलियों की ज्यादा गंभीर चुनौती का सामना करना पडेगा। विधानसभा चुनाव को लोक सभा चुनाव की तर्ज पर यदि प्रशासन लेता है तो ये उसकी हिमालयी भूल साबित हो सकती है क्योंकि प्रभाव और कार्य के विस्तार की वजह से ये ज्यादा इंटेंस होते हैं।

जिले के हालात ये हैं कि सभी छह विधानसभा क्षेत्र नक्सलियों के प्रभाव वाले हैं और यदि ओबरा को छोड दें तो बाकी पांच पर नक्सलियों का बेहद असर है। ओबरा के खुदवां इलाके और सोनतटीय इलाके भी नक्सल गतिविधियों के केन्द्र रहे हैं इसलिए उसे लेकर भी प्रषासन ज्यादा निश्चिंत नहीं रह सकता। कुटुम्बा के देव प्रखंड वाले इलाके तो नक्सलियों के गढ ही माने जाते रहे हैं।

प्रशासन के लिए प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के सभी उम्मीदवारों को सुरक्षा दे पाना एक बडी चुनौती होगी। इतना ही नही प्रत्याशियों के प्रचार वाहनों तक की सुरक्षा भी प्रशासन को करनी होगी। जिस बात के लिए प्रशासन और पुलिस हमेशा नक्सलियों से पिटती रही है वह है चुनाव के पहले या बाद में अन्य फेज के चुनावों के लिए जिले से पुलिस बल का अन्यत्र भेजा जाना। पुलिस की ये कमी जगजाहिर होती है और इसका लाभ नक्सली जम कर उठाते हैं।

पिछले वर्षों में पुलिस पर हुए लगभग आधा दर्जन हमले इन्हीं हालातों में हुए हैं। इन हमलों में पुलिस को बेवजह अपने जवान गंवाने पडते हैं पर पता नहीं ये रवैया बदला क्यों नहीं गया ? सबसे बडी समस्या सभी बूथों पर फोर्स की तैनाती की है। जिले के 1569 बूथों पर यदि चार- एक का बल भी दिया जाए तो प्रशासन को 7845 जवान व अधिकारी चाहिए। नक्सली इलाकों में आठ- दो से कम की तैनाती सुरक्षित नहीं मानी जाती। इस प्रकार ये संख्या 15690 हो जाती है। समस्या ये होगी कि इतनी बडी तादाद में पुलिस बल जिले को मिल पाना मुश्किल ही नजर आ रहा है। केन्द्रीय बल भी यदि मिलता है तो प्रशासन उसे बूथों पर तैनात कर नहीं पाता और न टुकडिम्यों में बांट कर इस्तेमाल कर पाता है। इसका इस्तेमाल सिर्फ गश्त के लिए होता है।

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