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मरिये और मारिये नहीं, बात कीजिए

कश्मीर घाटी में युवाओं का आंदोलन लंबा चल गया है और वह अब हर हाल में बंद होना चाहिए। बहुत सारे बच्चे मरे हैं, बहुतों के घर उजड़े हैं, लोगों के व्यापार, कारोबार चौपट हो गए हैं। अविश्वास का स्तर बहुत बढ़ गया है। दिल्ली से एक डॉक्टर जब गए तो वहां के एक आठ साल के बच्चों ने उनसे पूछा कि आपका लाइसेंस कहां है। उनके लाख कहने पर भी वह लाइसेंस देखे बिना माना नहीं। सोचिए, जहां के छोटे-छोटे बच्चों इस मानस में जी रहे हों, उस रियासत का, उस मुल्क का क्या होगा?

आम आदमी अब इससे ऊब गया है। वह किसी भी तरह इससे निजात पाना चाहता है लेकिन उसे भड़काने वाले मान नहीं रहे हैं। भड़काने वालों में कश्मीर के भी लोग हैं और पाकिस्तान के भी। उनसे बात करनी होगी, उन सबको समझाना होगा और शांत वातावरण में उनकी शिकायतें सुननी होंगी।

महबूबा मुफ्ती ने बुधवार की सर्वदलीय बैठक में यह बात ठीक ही कही कि इस देश में लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव और आडवाणी जैसे तमाम नेता हैं जो जनता से व्यापक संपर्क रखते हैं लेकिन उनमें से कोई भी इन तीन महीनों में कश्मीर नहीं गया। जाना चाहिए था। मर भी जाएं तो क्या फर्क पड़ता है? यह तो कहा जाएगा कि जनता के मकसद के लिए जान दी। हालांकि अब अगर सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल जा रहा है तो यह अच्छी पहल है। लेकिन मैं एक बात बता दूं कि कश्मीर की स्थितियां लंबे समय से बिगाड़ी जा रही हैं और तब वहां के बड़े नेताओं ने ध्यान नहीं दिया।

मैं जब छोटी थी तो बीमारी की हालत में श्रीनगर के एक अस्पताल में भर्ती थी। उस दौरान मैंने वहां के आम आदमी से मेल-मिलाप किया। धोबन के पास जाती थी, मछुआरों के पास जाती थी। कुछ उनका काम कर देती थी और वे मुझे कहवा पिलाती थीं, मछलियां देती थीं। इस दौरान मैं सुनती थी कि अनंतनाग तो कश्मीर का इस्लामाबाद है। यह सुनकर चौंक उठती थी, क्योंकि अनंतनाग तो हिंदुओं का बड़ा तीर्थ है। वह पाकिस्तान के एक शहर का नाम कैसे अख्तियार कर सकता है। इस तरह की भावनाएं आम आदमी ही नहीं, पढ़े-लिखे और प्रतिष्ठित लोगों में भी रही हैं।

गुलाम अहमद महजूर साहब कश्मीरी के बड़े कवि हुए हैं। उन्होंने कश्मीरी कविता को नई शैली दी। लेकिन वे लिखते थे कि ‘हिंदुस्तान मैं तुम पर अपनी जान कुर्बान करता हूं पर यह देह पाकिस्तान के साथ है।’ यह बात काफी खलने वाली थी। हैरानी की बात है कि उस समय शेख अब्दुल्ला साहब थे, बख्शी गुलाम मोहम्मद थे और भी कई महत्वपूर्ण राजनेता थे। इनमें बख्शी साहब तो लेखकों और कलाकारों की काफी कद्र करते थे और उनसे उनका रिश्ता भी करीबी था। फिर भी इनमें से किसी ने उन्हें रोका नहीं।

उनसे पूछा जाना चाहिए था कि वे ऐसा क्यों लिख रहे हैं। स्थितियां बिगाड़ने में इस तरह की भावनाओं का योगदान है। बड़े दुख की बात है कि जब लोगों को समझाने-बुझाने और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने का वक्त था तो कश्मीर में ऐय्याशियां होती रहीं।

एक जगह है डाचीगाम। वहां सारे अफसर जाते थे, औरतें जाती थीं और नाच होता था। उधर लोग आपस में झगड़े करते रहते थे। प्रशासन की इसी छवि को देखते हुए जनता उनसे निराश होती गई और पाकिस्तान व घाटी के पाकिस्तान परस्त लोग जनता को भड़काते रहे। उन लोगों को पाकिस्तान की हकीकत मालूम नहीं है। वे वहां जाकर कभी सुखी नहीं रहेंगे।

इस्मत चुगताई कहती थीं कि पाकिस्तान ने सिर्फ लोटे बनाए हैं। यही उनकी तरक्की का स्तर है। जाहिर है लोगों को समझाने का काम अभी तो राजनेता ही करेंगे क्योंकि साहित्यकार और कलाकार सब डरे दुबके पड़े हैं। वे महज लेख लिख रहे हैं और गोष्ठियों में जा रहे हैं। उन्हें अपनी भूमिका बढ़ानी चाहिए जोखिम उठाना चाहिए। 

मीडिया का रोल हो सकता है। लेकिन असरदार भूमिका के लिए राजनीतिकों को हस्तक्षेप करना होगा। पर यहां भी समझदारी और संवेदनशीलता से काम करना होगा। उसके लिए कोई फार्मूला नहीं चलेगा। यह कह देना कि युवा मुख्यमंत्री हैं तो युवा उनकी बात सुन लेंगे व्याहारिक नहीं है। उन्हीं के शासन में युवा सबसे ज्यादा उत्तेजित हैं और वे ही सबसे ज्यादा मारे जा रहे हैं।

यह ठीक है कि उमर अब्दुल्ला युवा हैं लेकिन वे उन युवाओं के बीच से नहीं हैं जो आंदोलन कर रहे हैं। उनका परिवार अब कश्मीर का राज परिवार बन चुका है। इसलिए वे लोगों से ज्यादा नहीं जुड़ पाते। पर यह कहना भी नहीं ठीक है कि उनकी जगह पर महबूबा मुफ्ती को मुख्यमंत्री बना दिया जाए तो स्थितियां ठीक हो जाएंगी। एक स्त्री होने के नाते वे मुख्यमंत्री बनें तो मुझे खुशी होगी पर वे उमर से बेहतर होंगी इसकी गारंटी नहीं है। इन दोनों से भी बेहतर लोग वहां हैं जिन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाए तो स्थितियां संभल सकती हैं। उन लोगों को आगे लाना चाहिए जो कश्मीर की अवाम से ज्यादा अच्छी तरह से जुड़े हैं। कभी कोई डोगरा भी कश्मीर का मुख्यमंत्री बनना चाहिए।

मैंने कश्मीर और जम्मू को कभी अलग करके नहीं देखा। इस तरह से देखे जाने की वजह से भी कई समस्याएं पैदा हुई हैं। मैं जब जम्मू जाती हूं और सेना के विमानों से फौजियों के ताबूत उतरते हुए देखती हूं तो मेरा कलेजा फट जाता है। इसी तरह कश्मीर घाटी में भी बच्चों के शव देखकर हर मां का कलेजा फट जाएगा। 

कश्मीरी पंडितों की दशा देखकर मुझे बहुत दुख होता है। वे बड़े कर्मठ लोग होते हैं जो अब जम्मू में जगह-जगह फटे हुए तंबुओं में रह रहे हैं। मेरे लिए जम्मू और कश्मीर दो आंखों की तरह हैं। अगर एक आंख फूट जाए या एक में मवाद भर जाए तो नजर तो ठीक नहीं रहेगी। इसलिए कश्मीर के मामले में किसी भी तरह की लापरवाही और देरी का बुरा असर पड़ेगा। यह असर वहां ही नहीं शेष भारत के मुसलमानों पर भी पड़ेगा। 

कश्मीर में अमन कायम करने और उस समस्या के समाधान लिए दिल्ली को दिल खोल कर जाना होगा। उनकी बहुत सी बातें माननी होंगी, उनके जख्मों पर मरहम लगाना होगा क्योंकि जिन माओं के बच्चों मारे गए हैं वे सरकार से हिसाब मांगेंगी और उनका ऐसा करना जायज भी है। पर मैं कश्मीरी युवकों से भी एक अपील करना चाहती हूं कि आप देश के मुस्तकबिल हैं। आप अपने को समझाइए, अपने बड़ों को समझाइए। बात कीजिए पर मारिये और मरिये नहीं। कश्मीर आपका भी है और मेरा भी है। मैं  इसे दूंगी नहीं तो आप लेंगे कैसे।

लेखिका जानी-मानी डोगरी साहित्यकार हैं।
प्रस्तुति- अरुण त्रिपाठी

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