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जहां भगवान राम ने भी किया था पिंडदान

जहां भगवान राम ने भी किया था पिंडदान

पितृपक्ष मेला (गया, बिहार), 24 सितम्बर से 7 अक्तूबर

भारतीय संस्कृति में अश्विन कृष्ण पक्ष पितरों को समर्पित होता है। इस अवसर पर अपने पूर्वजों को याद कर उनकी आत्मा की शांति एवं उन्हें प्रसन्न कर आशीर्वाद पाने की कामना ही मुख्य उद्देश्य होता है। यूं तो पितृपक्ष में देश के सभी प्रमुख तीर्थस्थानों पर पिंडदान एवं श्राद्ध करना उत्तम माना गया है, परन्तु इस अवसर पर बिहार के प्रमुख तीर्थस्थल गया में लगने वाले पितृ-पक्ष मेले में भारत से ही नहीं, अपितु विदेशों से भी हजारों भारतीय हिन्दू अपने पितरों का श्राद्ध, तर्पण एवं पिंडदान करने पहुंचते हैं। मान्यता है कि इस अवधि में श्रद्धापूर्वक तर्पण, जल, तिल, जौ और कुश से पिंड बना कर या फिर सांकल्पिक विधि से श्राद्ध करना, गौग्रास निकालना तथा उन के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन करा देने से पितृ प्रसन्न होते हैं और उनकी प्रसन्नता ही पितृ ऋण से मुक्त करा देती है। गया के विभिन्न धार्मिक स्थलों जैसे रामशिला, विष्णुपद मंदिर, प्रेम शिला, अक्षयवट, ब्रह्मयोनि हिल्स, फाल्गु नदी के तट पर तथा शहर के अन्य प्रमुख स्थानों पर 48 वेदियों का निर्माण कर श्रद्धालु भक्तों द्वारा पिंडदान किया जाता है।

मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान राम ने भी यहां आकर अपने पूर्वजों को प्रसन्न करने के लिए पिंडदान किया था। इसीलिए भगवान राम के नाम पर ही इस पहाड़ी का नाम रामशिला हिल्स कहलाता है।

पिंडदान के लिए दूसरा प्रमुख स्थान फाल्गु नदी के तट पर स्थित विष्णुपद मंदिर है। कहते हैं कि भगवान विष्णु ने इसी स्थान पर गयासुर नामक राक्षस का वध किया था। अभी भी यहां भगवान विष्णु के चरण चिन्ह चट्टान पर स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। पहाड़ी की तलहटी में स्थित ‘रामकुंड’ में स्नान कर श्रद्धालु पिंडदान करते हैं। गया के दक्षिण में स्थित ब्रह्मयोनि हिल्स स्त्री शक्ति के प्रतीक के रूप में पूजा जाती है। यहां भी हजारों श्रद्धालु पिंडदान करते हैं।

यहां आसपास घूमने की भी अनेक जगहें हैं। गया से 1 किमी की दूरी पर स्थित बौद्ध गया, बौद्ध धर्म के अनुयायियों का प्रमुख तीर्थ स्थल है। भगवान बुद्ध ने इसी स्थान पर ईसा पूर्व 531 में पवित्र बोधिवृक्ष की छाया में बैठ कर तपश्चर्या के द्वारा ज्ञान के प्रकाश का प्रथम साक्षात्कार किया था। 

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