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सीमित भूमि और असीमित भूख

उत्तर प्रदेश के किसान आंदोलन से 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन की बहस फिर उठ खड़ी हुई है। सरकार उसे पास कराने की जल्दी में है। दुर्भाग्य से जब भी यह मामला उठता है तो यह मुआवजे की राशि पर केंद्रित हो जाता है। यह बात संदेह से परे है कि  इन दिनों 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून का सरकार ने भारी दुरुपयोग किया है। जमीन अधिग्रहण के लिए सरकार ने ‘सार्वजनिक उद्देश्य’ जैसे प्रमुख दायरे का सहारा लिया है। सरकार ने इस बीच खेती की जमीन का बड़ा हिस्सा और जंगल, नदी की तलहटी, तालाब और ङीलों की ऐसी जमीनों का अधिग्रहण किया है जो पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील हैं। इसके एवज में जमीन के मालिकों को मुआवजे के तौर पर क्षुद्र राशि दी गई है और वह भी काफी समय बाद। कई मामलों में तथाकथित सार्वनजिक उद्देश्य के लिए तत्काल मजबूरी दिखाकर अधिग्रहीत की गई जमीन का या तो इस्तेमाल ही नहीं हुआ या उसका इस्तेमाल सार्वजनिक से इतर किसी और उद्देश्य के लिए किया गया। सरकार का दावा है और जिसे अदालत का भी समर्थन मिला है, कि एक बार जमीन का अधिग्रहण अंतिम हो जाए तो सरकार पूर्ण स्वामिनी हो जाती है। फिर वह जिस भी तरह से चाहे जमीन का उपयोग कर सकती है।
जमीन अधिग्रहण विधेयक में प्रस्तावित संशोधन तो और भी खराब है। इस संशोधन के अनुसार अगर जमीन को ‘किसी अन्य उद्देश्य के लिए’ अधिग्रहीत किया जाना है तो उसमें ‘व्यक्ति’ जिसका मतलब कंपनी भी है, वह परियोजना के लिए 70 प्रतिशत जमीन खरीद सकता है। उसके बाद बची 30 प्रतिशत जमीन सरकार अधिग्रहीत करेगी, इस प्रकार यह 100 प्रतिशत हो पाएगा। यह व्यक्तियों और कंपनियों के लिए संसाधनों का निजीकरण है, उसके अलावा कुछ नहीं है। इतना ही नहीं यह संशोधन इस कार्रवाई से प्रभावित लोगों के लिए शेयर और लाभांश की सीमा 30 प्रतिशत तक बांध देता है। इस नए बिल में पुनर्वास और पुनर्बसाहट (आर एंड आर) का प्रावधान उन लोगों के लिए राहत नहीं देता जो ‘स्वैच्छिक’ खरीद से प्रभावित हैं। लाभ सरकार की तरफ से ‘अनैच्छिक अधिग्रहण’ होने पर ही मिलना है।
मोटे तौर पर अधिग्रहण कानून में संशोधन और आर एंड आर बिल के तहत फायदा उन्हीं को मिलेगा जो बाकी 30 प्रतिशत वाली जमीन के दायरे में आएंगे। वह लाभ भी तब मिलेगा अगर वे एक निश्चित संख्या के भीतर आएंगे। मैदानी इलाकों में प्रभावित लोगों की यह संख्या 400 और उससे ऊपर और पहाड़ में 200 और उससे ऊपर की होगी। इस तरह पुनर्वास और पुनर्वसाहट का आश्वासन महज कागजों पर ही होगा, लोगों तक वास्तविक लाभ नहीं पहुंचेगा।
आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण के लिए जमीन आज एक महत्वपूर्ण संसाधन है। इसका इस्तेमाल समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अमीर और गरीब की खाई कम करने के लिए किया जा सकता है। संसाधनों का इस्तेमाल समझदारी से किया जाना चाहिए, उसे भावी पीढ़ी के लिए बचाकर रखना भी चाहिए। आज उद्योग, भवन निर्माण और एसईजेड वगैरह के लिए खेती की जमीन के व्यापक अधिग्रहण से उसका रकबा घटता जा रहा है। नतीजतन खाद्य सुरक्षा और देश की संप्रभुता के लिए बड़ा खतरा पैदा हो गया है। अगर हम भविष्य की परवाह करते हैं तो खेती की जमीन के अंधाधुंध अधिग्रहण पर रोक लगानी होगी। इस संशोधन के माध्यम से जो न्यूनतम काम किया जा सकता है वह 1990 के वन संक्षरण कानून की तरह यह संशोधन करना है कि सरकार की पूर्व अनुमति के बिना देश में खेती की किसी जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता। यह सुझाव कृ षि मंत्रलय की तरफ से भी दिया गया था लेकिन उसको संशोधन में न शामिल किए जाने की वजहें स्पष्ट हैं। यही स्थिति वन, तालाब, ङील, नदी, समुद्र और मुहाने जैसे पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील इलाकों की है। पर्यावरण की रक्षा इन दिनों काफी महत्वपूर्ण हो गई है, जिसमें इस इलाके में पड़ने वाली जमीन शामिल है। संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत आने वाले आदिवासियों के अधिकारों को सामान्य भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया से मुक्त रखा जाना चाहिए। इस तरह निर्णय लिए जाने से पहले की प्रक्रिया में उससे संबंधित सभी पक्षों जिसमें जन प्रतिनिधि भी शामिल हैं को जोड़ा जाना चाहिए। किसी जमीन की खरीद और अधिग्रहण के पहले उनकी चर्चा के माध्यम से एक योजना बनाई जानी चाहिए।

खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण के साथ किसानों सहित प्रभावित लोगों का विस्थापन एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। आज की कठिन स्थितियों में उनका पुनर्वास महज मुआवजे की रकम देकर नहीं किया जा सकता। पुनर्वास अपने में काफी जटिल प्रक्रिया है और इसमें मानवीय अस्तित्व और जीवन के कई आयाम शामिल हैं। इसी वजह से उस विकल्प को चुनना चाहिए जहां न्यूनतम विस्थापन हो। यह सही है कि विस्थापित व्यक्ति को उस फामरूले के आधार पर मुआवजा दिया जाना चाहिए जो उचित हो और शोषक न हो पर इतना ही काफी नहीं है। उनका विधिवत पुनर्वास होना चाहिए और पुनर्वसाहट भी। इसकी एक खास वजह यह है कि उनमें से ज्यादातर लोग शिक्षित नहीं हैं और उनके पास अपनी आजीविका के लिए खेती करने के अलावा कोई और कौशल नहीं है। उनके परिवार के पास कुछ न कुछ जमीन छोड़ी जानी चाहिए ताकि उनकी आजीविका पूरी तरह से न छिन जाए। इसलिए जमीन के बदले जमीन देनेवाला पुनर्वास ही वह तरीका है जिससे वे मकान और रोटी के मूल अधिकार को प्राप्त कर सकते हैं। जमीन की निजी खरीद हो या सरकारी अधिग्रहण हमें वैसा करने से पहले उसके सामाजिक प्रभाव, पर्यावरणीय प्रभाव और खाद्य सुरक्षा के लिए कृ षि की जमीन को बचाने पर विचार करना चाहिए। निर्णय ज्ञात सिद्धांतों और दिशा निर्देशों के आधार पर होना चाहिए। प्रभावित पक्षों के चाहने और उनके जीवन में और सुधार के लिए इस प्रक्रिया और उसकी शर्तो की न्यायिक समीक्षा का प्रावधान होना चाहिए।
आज जब भूमंडलीकरण और निजीकरण के दौर में चंद लोग संसाधनों पर एकाधिकार करने की कोशिश कर रहे हैं तो जमीन अधिग्रहण के बारे में पूरी मानसिकता में मौलिक बदलाव की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण व पारिस्थितिकी को संरक्षण देने की सारी समस्याएं किसी न किसी रूप में जमीन से जुड़ी हुई हैं। जब हम जमीन के इस्तेमाल पर संपूर्णता में विचार करेंगे तभी संवैधानिक उद्देश्य, सामाजिक न्याय, कल्याण और जनता की मानवीय गरिमा की गारंटी की जा सकती है। जमीन सीमित है लेकिन उसके दोहन की लालच असीमित है।
लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं   

 

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