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हिंदी का बढ़ता दायरा

मेरे साथ यह घटना तब घटी, जब मैं अपनी पत्नी के साथ पिछले 10 सितंबर को अमेरिका के नेवार्क एयरपोर्ट पर पहुंचा। वहां एक अमेरिकी कर्मचारी यात्रियों से कह रहा था- ‘जल्दी करो-जल्दी करो..आगे चलो..आगे बढ़ो।’ उसके मुंह से हिंदी सुनकर मुझे ऐसा लगा, जैसे वह एयरपोर्ट कर्मचारी भी हिंदी पखवाड़ा मनाने में व्यस्त हो। जो लोग हिंदी के भविष्य को लेकर चिंतित हैं, उन्हें इस अमेरिकी कर्मचारी का अनुकरण करना होगा। वह कर्मचारी जानता था कि जो यात्री उस वक्त उसके सामने से गुजर रहे थे, वे सभी दिल्ली से आई उड़ान से उतरे थे। इसलिए यह हमारा भी फर्ज है कि हम हिंदी का अपने देश में अधिकाधिक प्रयोग करें।
सुभाष लखेड़ा, ग्रीन्सबोरो, नॉर्थ कैरोलाइना 27455 

विज्ञान की सीमा
13 सितंबर को प्रकाशित संपादकीय ‘अनिश्चय का ब्रह्माण्ड’ विज्ञान की सीमित क्षमता को रेखांकित करने में सफल रहा है। विज्ञान जितना ही ब्रह्माण्ड के रहस्य का उद्घाटन करने के लिए गहरे उतरने की कोशिश करता है, रहस्य और गहराता जाता है। अनिश्चितता उतनी ही बढ़ती जाती है। ऐसा नहीं है कि विज्ञान प्रकृति के नियमों/रहस्यों को समझने में विफल रहा है, लेकिन ब्रह्माण्ड के निर्माण, जीवन की उत्पत्ति, कर्ता/ईश्वर के अस्तित्व को लेकर बहुत से प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं। अभी हाल ही में स्टीफन हॉकिंग ने लिखा है कि सृष्टि का निर्माण स्वत: हुआ है। उसमें न तो ईश्वर की कोई भूमिका है और न आवश्यकता। अगर मान लिया जाए कि गैलेक्सियो और मैटर की उत्पत्ति ‘ब्लैक होल’ के ‘बिग बैंग’ विस्फोट से हुई, तो फिर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ‘बैक होल’ से पहले क्या था? इसका अंत क्या होगा? उसके बाद क्या? अनेक प्रश्न अनुत्तरित हैं। जाहिर है, प्रकृति अपने में अनेक रहस्य छिपाए हुए है, जिसका रहस्योद्घाटन होना अभी बाकी है।
एस. शंकर सिंह , बी 003, डैफोडिल्स अपार्टमेंट, सेक्टर-6, द्वारका, नई दिल्ली-75

धन की बर्बादी
अब अगले साल हमारे देश में जाति के आधार पर जनगणना होगी और इस काम में 4,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। जाति के आधार पर जनगणना दरअसल राजनीतिक दलों की चाल है, ताकि इसके जरिये वे अपने वोट बैंक का पता लगा सकें। जब एक बार जनगणना शुरू चुकी है, तो दोबारा जाति की गिनती क्यों? अगर इस धन को देश के पिछड़े इलाकों के विकास पर खर्च किया जाए, तो न जाने कितने गांवों की तस्वीर बदल जाएगी, लेकिन क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के आगे सारे तर्क बेमानी हैं।
सोनवीर

कैसे जिएं इस महंगाई में?
पिछले एक साल से रोजमर्रा की जरूरत की चीजों के भाव सातवें आसमान पर हैं। इसके खिलाफ आवाज देश के प्रधानमंत्री तक पहुंची थी। उन्होंने दिसंबर 2009 तक महंगाई को काबू में करने की बात भी कही थी, पर वायदे के उलट रसोई गैस से लेकर सभी पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतें बढ़ा दी गईं। यदि आज जगह-जगह लोग कह रहे हैं कि आम आदमी के साथ हमदर्दी की कांग्रेस की पोल खुल गई है, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। एक ओर कांग्रेस पार्टी के युवराज गरीबी से झुलसते दलित परिवारों की झाेंपड़ियों में रातें बिताकर जन-हितैषी होने का संदेश दे रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर सत्तारूढ़ कांग्रेस महंगाई बढ़ाये जा रही है। इससे युवराज के किए-कराये पर भी पानी फिर रहा है। अब तो पानी सिर के ऊपर आ गया है। लोग महंगाई से बेचैन हो उठे हैं। कांग्रेस को इसकी कीमत चुकानी पड़  सकती है।
घनश्याम त्रिपाठी

सलमान की संवेदना
सलमान खान ने अपने कहे की माफी मांग ली है। 26/11 के आतंकी हमले के शिकार परिवार वालों को इससे जरूर राहत मिली होगी। लेकिन सवाल यह है कि जिन लोगों को हम अपने समाज के आइकॉन के रूप में देखते हैं, वे इतने गैरजिम्मेदार कैसे हो जाते हैं? लोग उन्हें देखकर हंसते-रोते हैं और उनका धंधा चलता रहता है। लेकिन यह आधा सच है। सलमान जैसे कलाकारों की अपील यदि देश के दो दर्जन लोगों को भी प्रेरित करती है, तो उन्हें अपने आचरण को संतुलित रखना चाहिए। तब तो और, जब पड़ोसी मुल्क के बारे में दिया गया उनका कोई बयान राष्ट्र हित के खिलाफ हो। फिर मौत किसी की भी हो, वह जीवन की अंतिम सचाई है और उसका सम्मान किया जाना चाहिए। मेरी निगाह में मनुष्य होने की यह पहली बुनियादी शर्त है।
मान्या सिंह , गली नंबर-16, गुरु रामदास नगर, दिल्ली-92

चरखा और कपास
हिंदी दिवस पर
वह अंग्रेजी में भाषण देता है
और बदले में पांच हजार का
पुरस्कार लेता है,
जिसने कभी तुकबंदी नहीं की
वही आज कवि है,
जिसे सरकारी रेवड़ियां
मिल गईं खैरात में
बस उसकी ही छवि है।
यह तो अपना इतिहास है
बापू के हाथ में चरखा है
चमचों के हाथ कपास है।
अशोक मनोरम, साहिबाबाद

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