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संवेदनहीन संस्कृति

सोमवार को लाहौर में एक नवजात की मौत ने घृणास्पद वीआईपी संस्कृति को फोकस में ला दिया है। खबरों में बताया गया है कि नवजात बच्चे की मौत इसलिए हुई, क्योंकि उसे बच्चों के अस्पताल में इलाज नहीं मिल पाया। अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में बच्चों को दाखिला इसलिए नहीं मिल पाया क्योंकि वहां पंजाब के मुख्यमंत्री का दौरा हो रहा था, इसलिए सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था थी। नवजात के पिता से कहा गया कि अगर उसे वार्ड तक पहुंचना है, तो सीएनईसी की एक कापी देनी होगी। पंजाब सरकार का कहना है कि बच्चों के अभिभावकों को मुआवजा मिलेगा। इस तरह के संवेदनहीन बयानों से त्रासदी कम नहीं होती। राज्य की नाकाबिली के चलते हुए एक नवजात की मौत का क्या मुआवजा दिया जा सकता है? इस तरह की त्रासद घटना अपने आप में अकेली नहीं है, क्योंकि वीआईपी संस्कृति महज पंजाब तक सीमित नहीं है। यह तो देशव्यापी कहानी है।  
द डान, पाकिस्तान

डॉक्टरों की चालाकी
एक समूह के तौर पर अस्पतालों के जूनियर डॉक्टर अपने वेतन में होने वाले भेदभाव के खिलाफ आगे आने में कभी पीछे नहीं रहे हैं, लेकिन उनका मौजूदा आंदोलन कपट की इंतहा है। वे अपने इस अभियान में कह रहे हैं कि ‘कृपया हमें हर हफ्ते ज्यादा काम करने दो, अगर हम काम नहीं करेंगे तो योग्य डॉक्टर कैसे होंगे।’ वे दरअसल यूरोपीय संघ की वर्किग समय सारिणी पर आपत्ति कर रहे हैं, जो उनके हर हफ्ते काम की सीमा को 48 घंटे में बांध देती है। अपने मकसद को पूरा करने के लिए सोमरसेट स्थित मसग्रूव पार्क अस्पताल में हुई दो मौतों का हवाला दे रहे हैं। सांस का एक मरीज आपातकालीन वार्ड में पांच घंटे तक इंतजार करने के बाद मर गया और एक बूढ़ा मरीज भी इसलिए दम तोड़ गया क्योंकि वहां सौ मरीजों पर एक ही जूनियर डॉक्टर था।
द इंडिपेंडेंट, ब्रिटेन 

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