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भेलपूरी, ढाबा और बिंदास हुए इंटरनेशनल

भेलपूरी, ढाबा और बिंदास हुए इंटरनेशनल

लीजिए एक और हिंदी दिवस आ गया है। जिसे कुछ हिंदी प्रेमी ‘हिंदी श्राद्ध दिवस’ भी कह रहे हैं। भाव यह है कि अपने देश में हिंदी हार रही है। तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। वो ये कि आक्सफोर्ड डिक्सनरी के 11वें संस्करण में 80 हिंदी के शब्दों ने जगह बना ली है।

भले ही अपनी मिट्टी में हिंदी की जड़ें कुछ कमजोर हो रही हों। लेकिन सात समंदर पार हिंदी का परचम लगातार बुलंद हो रहा है। आक्सफोर्ड डिक्शनरी के हालिया 11वें संस्करण में हिंदी के 80 शब्दों ने जगह बना ली है। इन शब्दों में बिंदास, लहंगा, मसाला, बदमाश, हवाला, बंद, चमचा शामिल हैं। आध्यात्म के क्षेत्र के चर्चित शब्द योग, कर्म, धर्म, निर्वाण, गुरु जैसे शब्द तो दो दशक पहले ही इंटरनेशनल मार्का हो चुके हैं। अब बात भेलपूरी, ढाबा जैसे शब्दों तक पहुंच चुकी है।
 
इस तरह आक्सफोर्ड में हिंदी के शब्दों का योग 700 तक पहुंच गया है। कुछ शब्द तो वाया आक्सफोर्ड वापस हिंदी के देश में आकर अपनी नई स्वीकार्यता प्राप्त कर रहे हैं, जैसे योग- योगा हुआ तो बंगला- बंगलो और पायजामा- पैजामा हो चुका है।

जानकारों का मानना है कि अंग्रेजी अब आगे का रास्ता अख्तियार करने के लिए दूसरी भाषाओं पर निर्भर है। इसमें हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाएं सबसे अधिक मददगार हैं। फिर जैसे जैसे ‘ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास’ लंदन, न्यूयार्क की गलियों में अपनी धमक बढ़ा रहा है, हिंदी का कद भी बढ़ता जा रहा है।

तथ्य यह भी है कि अंग्रेजी में बोलचाल करने वाले लोगों का तीसरा सबसे बड़ा समूह भारत में निवास करता है। आक्सफोर्ड में शामिल हिंदी शब्दों का तो आंकड़ा तो मिल गया लेकिन आम भारतीय बोलचाल में रोजाना अंग्रेजी के कितने शब्द शामिल हो रहे हैं इसका हिसाब रखने वाला कोई नहीं है।

प्रमुख साहित्यकार प्रो. लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ कहते हैं कि अपने देश में हिंदी संस्कृतनिष्ठ शुद्धता के फेर में आम लोगों से दूर हो रही है जबकि विदेश में लोकप्रियता के बल पर हिंदी आगे बढ़ रही है। बटरोही का यह भी कहना है कि राजभाषा के पैरोकार अगर नहीं सुधरे तो वो दिन दूर नहीं जब हमारी लिपी रोमन होगी।

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