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रंग-रंग की बात

नेशनल नौटंकियों में अब कोई विषय अछूता नहीं रहा। इस फोकोक्लासिकल विधा का शिल्प तो वही ट्रेडिशनल है, लेकिन कथ्य में नए कल्ले फूटने लगे हैं। एक नए प्रयोग के अनुसार लैला काली थी लेकिन मजनूं के ऊपर वो काले आतंकवाद के रूप में नहीं छाई थी। पुरानी नौटंकियों में छंद, दोहा, चौबोला, लावनी आदि बंदिशें थीं। अब वे केवल आड़ा चौताला तक सीमित हैं।

पब्लिक को भी अब नेताओं की फिसली जबान के अंगारे याद नहीं रहते। उसे तो रोज नई नौटंकी चाहिए। फिल्मों, सीरियलों, रियलिटी शो आदि ने पुरानी नौटंकी को गोद में ले लिया है। लहंगे वाली लैला को मिनी स्कर्ट में देखना उत्तर आधुनिक अनुभव है। मजनूं खुद अमरीका पलट लगता है। रोमियो जूलियट का जमाना लद गया। अब वे लिव इन रिलेशनशिप के अंतर्गत आते हैं।

कभी अंग्रेज खुद गोरा साहब था और भारतीयों को काला कहता था। आज भारतीय खुद काले अंग्रेज हो गए हैं। इसे परम्परा में परिवर्तन कहा जाता है। अब अमरीका इस परिवर्तन की कलाई मरोड़ कर नया प्रयोग कर रहा है। पुरानी नौटंकी कभी मनोरंजन के टॉप पर थी। आज वो टॉपलेस हो रही है। कफन में जेबें नहीं हैं लेकिन घर बाजार में बदल रहा है। अब नक्कारखाने को ही लो, कभी यहां एक कोने में तूती भी पड़ी रहा करती थी।

आज वो आधुनिक पत्नियों की मांग के सिंदूर की तरह गायब है। रूढ़ियों के पुराने रंगों में अब नई छुवन है। इन्हें पोतना भी एक कला है। हुसैन होने के लिए मकबूल फिदा होना जरूरी है। ‘छिनाल’ होने से पहले कैरेक्टर की दरकार होती है। साहित्य में भी इधर सफेद आतंकवाद चल रहा है। यहां तो कोई सामंत या पुराना जमींदार होकर भी नक्सली हो सकता है। इसके लिए चेहरों पर रंग पोतना जरूरी नहीं है।

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