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केंद्र में कश्मीर

उमर अब्दुल्ला सरकार ही नहीं, केंद्र की मनमोहन सरकार के लिए भी कश्मीर अब केंद्रीय मुद्दा बन चुका है और बिना कोई देरी किए वहां की आग को ठंडा करने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। इसीलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कश्मीर के किसी भी समूह या व्यक्ति से संविधान के दायरे में बातचीत करने का आह्वान किया है, पर क्या उनका यह आह्वान वहां की अवाम को शांत करने के लिए काफी है? शायद नहीं।

इस तरह का बयान वे पहले भी दे चुके हैं और उसका कोई असर नहीं पड़ा है। बल्कि घाटी का जनअसंतोष शांत होने की बजाय लगातार बढ़ता ही जा रहा है। उनका जुनून अब सांप्रदायिकता और आर्थिक हितों के वश में नहीं है। कश्मीर के आम व्यापारी और कारोबारी ही नहीं हर पढ़ने-लिखने वाले युवा को इस पथराव आंदोलन की भारी कीमत भी चुकानी पड़ी है। इसके बावजूद अलगाववादी इसे वापस लेने को तैयार नहीं है।

उनके नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद आंदोलन के दायरे और उसके उग्र तेवर पर फर्क नहीं पड़ा है, बल्कि वहां भारत विरोध जिस तरह से गली मोहल्ले की आवाज बन रहा है, उससे लगता है कि अब यह मसला मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की प्रशासनिक और राजनीतिक विफलता का नहीं है। आंदोलनकारियों की यह मांग जरूर है कि घाटी से सशस्त्रबल विशेष अधिकार अधिनियम हटा लिया जाए, लेकिन यह मामला उतना ही नहीं है।

यह मामला दिल्ली और घाटी के रिश्तों का भी है। उमर अब्दुल्ला उसे बनाने और बिगाड़ने में दिल्ली के एक प्रतिनिधि के रूप में जरूर काम कर रहे हैं, पर उसका सारा दारोमदार उन्हीं पर नहीं है। अलगाववादी जानते हैं कि वे जो मांग कर रहे हैं, उसे देने का अधिकार उमर के पास है भी नहीं, इसलिए अब उनके निशाने पर उमर से ज्यादा केंद्र सरकार है। ऐसे में केंद्र सरकार को अपनी ताकत और सूझबूझ दोनों का परिचय देना होगा।
  
केंद्र सरकार की दिक्कत यह है कि जब वह सशस्त्र बल विशेष अधिनियम वापस लेने की तैयारी करती है तो सेना सहमत नहीं दिखती और जब स्वायत्तता की पहल करती है तो विपक्षी पार्टी भाजपा विरोध में खड़ी हो जाती है। दूसरी तरफ अलगाववादियों की तरफ से बीच-बीच में धमकियां आती रहती हैं कि अब संविधान के दायरे में बातचीत का समय निकल गया है। ये अड़चनें हैं और इन्हीं से सरकार पसोपेश में है, पर देश हित में इन अड़चनों को पार करना असंभव नहीं है।

प्रधानमंत्री ने इससे पहले भारत-अमेरिका परमाणु करार के मुद्दे पर अपनी अद्भुत राजनीतिक कुशलता का परिचय उसी तरह दिया जिस तरह वे अर्थव्यवस्था को हर तरह के संकट से उबारने में देते रहे हैं। उन्होंने घाटी में रेल चलाने से लेकर वहां निष्पक्ष चुनाव कराने तक के दिल जीतने वाले काम किए हैं। आज जरूरत इस बात की है कि सरकार एक तरफ पिछले दो महीनों की हिंसा में मारे गए युवकों के परिजनों के साथ खड़ी हो तो दूसरी तरफ भारत की दीर्घकालिक कश्मीर नीति के कुछ पत्ते खोले। हमारी सरकार भारतीय  संविधान के दायरे में कश्मीर की स्वायत्तता पर कहां तक जा सकती है और कहां तक नहीं जा सकती, ये बातें कश्मीर के लोगों के साथ ही बाकी दुनिया को भी स्पष्ट की जानी चाहिए।   

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