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दो टूक (13 सितंबर, 2010)

नदी अपना रास्ता खुद बनाती चलती है। आधुनिकता में डूबे कथित विकास के रास्ते बाधा आई तो हमने नदियों को अवरूद्ध किया। उसके पानी को उससे छीना। बांधा।

बेसिन में घर बनाया। और तो और, देवी और पवित्र नदियों में तमाम कूड़े, कचरे, मल, दूषित जल डालकर उसे उथला कर दिया। यहां तक हमारी बारी थी। अब नदी की बारी है। जब उसे आगे बढ़ना है तो उसी की चलेगी। हम-आप बस बेबस रहेंगे।

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  • Web Title:दो टूक (13 सितंबर, 2010)