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उर्दू मीडिया : चुनावी चकल्लस और बिहार

मोहतरमा सोनिया गांधी के चौथी बार कांग्रेस अध्यक्ष बनने, झारखंड में सरकार बनाने को लेकर बीजेपी की कवायद और कई दिनों तक नक्सलियों की गिरफ्त में फंसे रहने के बाद तीन बीएमपी जवानों की रिहाई जैसी घटनाओं में यूं तो कोई समानता नहीं दिखती, पर बिहार विधानसभा चुनाव के संदर्भ में देखें, तो इनके आपस में जुड़े होने का अहसास होता है।

ये घटनाएं शक्ति परीक्षण और बेहतर प्रबंधन की नजीर मानी जा सकती हैं, जिनका प्रदर्शन छह चरणों में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान होने वाला है। नक्सली फिर चुनाव में खलल डालने के प्रयास करेंगे। उम्मीदवारों, मतदाताओं और सुरक्षा व मतदान प्रक्रिया में लगे लोगों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा सकती है। उस वक्त नीतीश कुमार की उनसे निपटने की क्या रणनीति होगी, यह देखना दिलचस्प होगा।

सोनिया गांधी के एक बार फिर पार्टी सदर बनने पर उनकी कार्यशैली का कायल उर्दू मीडिया यह भी देखना चाहता है कि इस दफा उनकी पार्टी पटना में कोई कारनामा अंजाम दे पाती है या नहीं। लखनऊ के ‘अवधनामा’ में सैयद आफताब रिजवी कहते हैं- सोनिया की बदौलत प्रतिभा पाटिल राष्ट्रपति, मीरा कुमार लोकसभा अध्यक्ष और डॉ. मनमोहन सिंह दूसरी बार वजीर-ए-आजम बने हैं। उनके प्रयासों से आज कांग्रेस केंद्र के अलावा कई राज्यों में सत्ता में है।

‘मुंसिफ’, ‘वर्ल्ड कप 2011 : टीम इंडिया और राहुल गांधी’ में कहता है- अब उनके सामने यूपी और बिहार जैसे बड़े प्रदेशों में कांग्रेस का परचम बुलंद करने की बड़ी चुनौती है। अखबारों की समझ है कि राहुल तभी सफल प्रधानमंत्री साबित होंगे, जब इन सूबों में पार्टी का एकछत्र राज हो। आबादी के लिहाज से देश के तीसरे बड़े सूबे बिहार में अक्टूबर-नवंबर में चुनाव होने हैं। यहां के तकरीबन साढ़े पांच करोड़ मतदाता 243 सीटों के उम्मीदवारों का भाग्य तय करेंगे।

मुंबई के ‘इंकलाब’ की नजरों में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद के मजबूत दावेदारों में हैं। अखबार ‘बिहार में इंतखाबी बिगुल’ में कहता है- सभी लीडरों में उनकी छवि अच्छी है। वह औरों से बेहतर, ताकतवर और तरक्कीपसंद दिखते हैं। उनकी इच्छाशक्ति से ‘जंगल राज’ का कलंक बिहार के माथे से मिटा है। नीतीश के कार्यकाल में औद्योगिक विकास भले न हुआ हो, पर अपराध और अपराधियों पर लगाम लगाई जा चुकी है। 

वर्ष 1950 में प्रकाशित चर्चित पुस्तक ‘पॉलिसी एंड एडमिनिस्ट्रेशन’ का हवाला देते हुए लेखक ने लिखा है कि तब के बिहार के सरकारी प्रबंधन को हिन्दुस्तान के बाकी राज्यों से बेहतर बताया गया था। किताब में उम्मीद जताई गई थी कि यह भविष्य का मिसाली राज्य बनेगा। हुआ इसके उलट। बाद के हुक्मरानों ने काफी मायूस किया।

नीतीश के प्रयासों से हालत सुधरी है। सब कुछ ठीक हो गया है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, पर अखबार समझते हैं कि बीजेपी के साथ सत्ता में भागीदारी को नजरअंदाज कर दिया जाए, तो उनकी सेक्युलर छवि पर उंगली नहीं उठाई जा सकती।

‘जदीद खबर’ कहता है- बिहार में भाजपा की छवि नरेंद्र मोदी के गुजरात जैसी नहीं है। मुसलमान भाजपा का साथ नहीं देते, तो शाहनवाज हुसैन का 19 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले भागलपुर से जीतकर लोकसभा में पहुंच पाना संभव नहीं था। अखबारों की मानें, तो बिहार के मुसलमानों की तमाम राजनीतिक दलों से एक गंभीर शिकायत है।

आबादी के लिहाज से 17 प्रतिशत होने और करीब 60 सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाने के बावजूद उन्हें नुमाइंदगी देने में कंजूसी बरती जाती है। डॉक्टर मंज़ूर आलम लिखते हैं-कोई सियासी पार्टी मुसलमानों को वाजिब हक देने को राजी नहीं। नीतीश के मंत्रिमंडल में भी मात्र एक मुस्लिम है। 

उर्दू अखबारों की नजरों में बिहार चुनाव में कामयाबी के लिए कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल-लोक जनशक्ति पार्टी गठबंधन को कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। ‘औरंगाबाद टाइम्स’ कहता है- नीतीश केंद्रीय योजनाओं को अपने नाम लागू करवाकर खूब वाहवाही बटोर रहे हैं। आरजेडी का पिछला कारनामा उसका पीछा नहीं छोड़ रहा है।

मुंबई के एक अखबार ने कुख्यात पूर्व सांसद सैयद शहाबुद्दीन से जेल में मिलकर समर्थन मांगने की लालू की हरकत की आलोचना की है। ‘बिहार में कांग्रेस के लिए उम्मीदवारों का क़हत’ शीर्षक से ‘सहाफत’ कहता है- चुनाव सिर पर है और कांग्रेस को मजबूत उम्मीदवार नहीं मिल रहे हैं।

बिहार का कोई दल कांग्रेस से समझौता करने का ख्वाहिशमंद नहीं है। हालांकि चुनाव अपने अनुकूल करने की खातिर कांग्रेस ने बिहार के अध्यक्ष पद पर एक मुस्लिम को बैठाया है। राहुल भी यहां का दौरा कर गए हैं। इन कोशिशों से इसके पक्ष में कितना चुनावी माहौल बनता है, इस पर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी।

लेखक हिन्दुस्तान से जुड़े हैं

malik_hashmi64@yahoo.com

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