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हम तो हैं महान

हिन्दी में कई जनोपयोगी कहावतें हैं। ‘ऊँची दुकान, फीके पकवान’, ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’ जैसी। हमें इन्हीं का ख्याल आता है, जब हम रहमान साहब द्वारा गाये और बनाये गये कॉमनवेल्थ गेम्स के आशय गान की आलोचना सुनते हैं। अधिकांश देशवासियों के समान हमने भी यह पांच करोड़ी गीत नहीं सुना है, पर यही तो अपनी चारित्रिक विशेषता है, कोई किसी की तारीफ करे तो हम घुघ्घू जैसी शक्ल बनाए चुप रहते हैं।

अज्ञेय के सन्नाटे के छंद की तरह। जानकार बताते हैं कि अज्ञेय जी ने एक कोई सन्नाटे का छंद ईजाद किया था। वह उसे अकसर ‘बुनते’ रहते।  जैसे भद्र महिलायें ऊन के गोले से खेलती हैं। उनमें और अज्ञेय में सिर्फ इतना फर्क है कि वह खेलते वक्त भी चहचहाती हैं और अज्ञेय अपनी बुनाई चुपचाप करते हैं। अपने समकालीनों पर जब दूसरे मित्रवत कीचड़ उछालते तो भी क्या वह मौन का मकबरा बने रहते? न उनकी दाढ़ी हिलती न ओंठ, न आंखों में चमक आती।

अब भैया, हम कैसे बतायें? हम उनके अंतरंग तो थे नहीं। जो है, वह उनकी यायावरी प्रवृत्ति, करीने से सजे कमरे, महिलाओं के प्रति आदर, बीच नदी में कविता पढ़ना जैसे वर्णन करते हैं। यह विद्वान अनपढ़ किस्म के हैं। इन्हें इतना भी नहीं पता है कि दूसरे की प्रशंसा से जलना और आलोचना की पवित्र आग में घी डालना, इंसान की पहचान है।

अन-पढ़ आलोचना के राग में तबले की तरह बजना ही हमें देश के बहुसंख्यक विद्वानों की पंगत में रखता है। इससे हमें देश की इन महान हस्तियों के समकक्ष होने का भ्रम होने लगा है। हम और जोर-शोर से अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त रहमान की ऐसी-तैसी में जुट जाते हैं।                    

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